हल्द्वानी। प्रदेश सरकार की हीलाहवाली के चलते पर्वतीय क्षेत्र में पैदा होने वाले प्रसिद्ध शिमला आलू के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। यदि समय रहते इस प्रजाति के बीज को संरक्षित करने की पहल नहीं हुई तो भविष्य में लोग शिमला आलू के स्वाद से वंचित हो जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले वर्षों के दौरान समय-समय पर हुई दैवीय आपदा के चलते पहाड़ में आलू का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहीं दूसरी ओर विभागीय स्तर पर सरकारी फार्मों के लीज पर दिए जाने से इस प्रजाति के आलू के बीज का उत्पादन बंद हो गया है। अब गांवों में गिने चुने काश्तकारों के पास ही शिमला आलू की प्रजाति का नाममात्र ही बीज शेष है।
जिले में भीमताल विधानसभा क्षेत्र के धारी और ओखलकांडा के गांव आलू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। लगभग एक दशक पहले तक विभाग रामगढ़ ब्लाक के मनाघेर, सूपी और गागर स्थित उद्यान विभाग के फार्म में शिमला आलू की प्रजाति के बीज का उत्पादन करता था। इसके अलावा काश्तकार स्वयं भी शिमला आलू के बीज को अगले साल लगाने के लिए सुरक्षित रख लेते थे। लेकिन वर्ष 2013-14 के बाद से कभी अतिवृष्टि तो कभी सूखे के चलते धारी और ओखलकांडा ब्लाक के गांवों में आलू की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई है। कभी अत्यधिक बरसात के चलते आलू की फसल खेत में ही सड़ गई तो कभी सूखे के कारण आलू की पौध ही पैदा नहीं हुई। ऐसे में आलू उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
धारी क्षेत्र के प्रमुख आलू उत्पादक और किसान संगठन के अध्यक्ष प्रदीप बिष्ट बताते हैं कि जब से सरकार ने मनाघेर, सूपी और गागर स्थित सरकारी फार्मों को लीज पर दिया है तब से इनमें काश्तकारों के लिए आलू के बीज का उत्पादन नहीं होता है। बिष्ट का कहना है कि दैवीय आपदा के कारण काश्तकारों के पास अपना संरक्षित बीज भी अब नहीं रहा है। ऐसे में शिमला आलू के बीज पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। बिष्ट बताते हैं कि इस संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्री से लेकर विभागीय अधिकारियों को कई पत्र लिख चुके हैं लेकिन अभी तक शिमला आलू के बीज को संरक्षित करने की पहल नहीं हुई है। पोखराड़ निवासी आलू उत्पादक किशन सिंह, धानाचूली
निवासी हरेंद्र सिंह, सुंदरखाल निवासी दुर्गा सिंह, परबड़ा निवासी उमेश सिंह, पलड़ा देवनगर निवासी दीपक दानी और दीनी गांव निवासी प्रेम राम का कहना है कि सरकार को शिमला आलू बीज के संरक्षण के लिए ठोस पहल करनी चाहिए ।
वर्ष 2013-14 से नहीं मिला आलू बीमा योजना का लाभ
हल्द्वानी। धारी और ओखलकांडा ब्लाक के आलू उत्पादकों को प्रीमियम भरने के बाद भी वर्ष 2013-14 से आलू बीमा योजना का लाभ नहीं दिया गया है। इससे अकेले धारी के 30 ग्रामसभाओं के साथ-साथ ओखलकांडा के 20 ग्रामसभाओं के आलू उत्पादक परेशान हैं। आलू उत्पादकों के मुताबिक उन्होंने कुल उत्पादन का पांच फीसदी प्रीमियम हर साल बीमा कंपनी में जमा किया। दैवीय आपदा में आलू की फसल खराब होने के बाद भी बीमा योजना का लाभ नहीं दिया गया। किसान संगठन के अध्यक्ष प्रदीप बिष्ट बताते हैं कि कई बार बीमा कंपनियों से बीमा योजना का लाभ देने की मांग की गई लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई।
पूर्व में उद्यान विभाग के गागर स्थित आलू शोध केंद्र में शिमला आलू के बीज का उत्पादन होता था लेकिन बाद में उसे केंद्र को सरकार ने लीज पर दे दिया, जिससे यहां बीज का उत्पादन बंद हो गया। वर्ष 2013-14 के बाद से शिमला आलू में झुलसा रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। इससे भी इस प्रजाति के आलू का उत्पादन घटा है। इसे देखते हुए विभागीय स्तर पर आलू उत्पादकों को शिमला आलू के बजाय कुफरी ज्योति, कुफरी गिरीराज और चंद्रमुखी प्रजाति के आलू का बीज उपलब्ध कराया जाने लगा है। - टीएन पांडे, आलू और शाकभाजी अधिकारी, नैनीताल