ज्योलीकोट (नैनीताल)। ज्योलीकोट कर्णप्रयाग मार्ग पर अंग्रेजी शासनकाल वर्ष 1916 में बना ब्रेवरी पुल सौ साल का हो चुका है। इसकी लंबाई 39 मीटर है और इसे उत्तराखंड की लाइफ लाइन भी कहा जाता है। अपनी मजबूती और उच्च गुणवत्ता के लिए माने जाने वाले इस पुल की पिछले दशक में जमकर उपेक्षा की गई है। लोक निर्माण विभाग के अधीन रहने तक इस पुल की हालत इतनी बदतर नहीं हुई थी। लोक निर्माण विभाग प्रति वर्ष रंग रोगन और इसकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखता था। एनएच को हस्तांतरण के बाद इसकी सुरक्षा पर ध्यान देना छोड़ दिया गया और हस्तांतरण के दस वर्षों में एनएच के अधिकारियों ने इस महत्वपूर्ण पुल पर रंग रोगन करना तक उचित नहीं समझा। जबकि विभाग मार्ग के रखरखाव के नाम पर प्रतिवर्ष बड़ी रकम खर्च करता है। बलिया नाले पर बने इस पुल को आज हुए हादसे में काफी नुकसान पहुंचा है। बलियानाला संघर्ष समिति के इंदर नेगी पुल की उपेक्षा से खिन्न हैं। उन्होंने मांग की है कि इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
सुरक्षित स्थान पर शरण ली
वीरभट्टी पुल पर हुए हादसे को याद कर घटनास्थल के सबसे नजदीक पचास मीटर की दूरी पर सपरिवार रहने वाले इंदर नेगी सिहर जाते हैं। आग को बेकाबू देख उन्होंने घर और दुकान को जस की तस हालत में छोड़कर परिजनों सहित सुरक्षित स्थान की शरण ली। दुकानदार विजय रौतेला व शकील समेत बिष्ट इस्टेट में कार्य कर रहे बिट्टू, राजू, फल विक्रेता रईस, मनोज आदि भी सुरक्षित स्थानों पर चले गए।
वर्ष 2014 में भी लगी थी टैंकर में आग
वर्ष 2014 में वीरभट्टी पुल से लगभग 100 मीटर आगे डीजल और पेट्रोल से भरे टैंकर के केबिन में आग लग गई थी। लेकिन उस समय ज्योलीकोट में एसएसबी 43वीं बटालियन थी। जवानों के सहयोग से स्थिति को विस्फोटक होने से पहले ही नियंत्रण कर लिया गया था।
गैस चोरी भी है कारण
गैस वाहनों में मानकों की अनदेखी के साथ-साथ सिलेंडरों से गैस चोरी भी बड़े पैमाने पर की जाती है। लोगों के मुताबिक गैस प्लांट से सिलेंडर लाने के बाद रास्ते में ट्रक चालक सिलेंडरों से थोड़ी-थोड़ी गैस निकालकर बेच देते हैं। इससे गैस रिसाव होता है और दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।