दमुवाढूंगा का मामला 110 साल पहले शुरू हुआ था। जब जंगलात ने जमींदार से लीज पर दुमवाढूंगा की जमीन ली थी। शासन ने दमुवाढूंगा का इतिहास भी खूब खंगाला है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक दमुवाढूंगा की जमीन 1905 तक जमींदार के पास थी।
बाद में वन महकमे ने 30 साल की लीज पर यह जमीन ली। जो कि 1935 में खत्म हो गई। इसके बाद कोई भी प्रक्रिया नहीं हुई। 1959 में यूपी के समय वन भूमि घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। बाकायदा 1965 में इस इलाके को आरक्षित वन भूमि घोषित कर दिया गया। जो कि रामनगर वन प्रभाग के अधीन आया।
इसको लेकर निवासी नित्यानंद भट्ट ने कोर्ट में केस किया। उनका कहना था कि उनके पास 8.28 कृषि भूमि है, ऐसे में इसे वन भूमि घोषित नहीं किया जा सकता है। 1970 में मुंसिफ कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला दिया। इसको लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।
1990 में फैसला नित्यानंद भट्ट के पक्ष में आया। पर जंगलात का कहना था कि यह आदेश केवल नित्यानंद की जमीन तक सीमित है। ऐसे में 1993 में शेष बची जमीन को आरक्षित वन भूमि घोषित करने की प्रक्रिया शासन ने शुरू की।
वन अधिनियम-1927 के तहत धारा-4 की अधिसूचना जारी करते हुए फारेस्ट सेटेलमेंट आफिसर को तैनात किया गया। 1999 में फारेस्ट सेटलमेंट आफिसर ने इलाके को आरक्षित वन भूमि घोषित करने की संस्तुति की। इसके बाद भाष्कर गुरु निंरजन आदि हाईकोर्ट गए।
जहां पर कोर्ट ने कहा कि मामले में राज्य सरकार फैसला करे। फिर जंगलात के इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गया। जहां सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप नहीं किया।
बताया जाता है कि 2007 में शासन ने आरक्षित वन भूमि घोषित (अंतिम अधिसूचना जो कि वन अधिनियम-1927 की धारा-20 के तहत जारी होता है) करने का मन तो बनाया, लेकिन उसकी प्रक्रिया पूरी नहीं। इसके बाद से मामला लटका हुआ था। शासन ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए यह ‘रास्ता’ निकाल लिया।