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'हमला कर रहे थे केदारनाथ में घूम रहे जानवर'

Wed, 10 Jul 2013 08:57 AM IST
विनय बहुगुणा
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रात में चारों ओर अंधेरे के बीच झमाझम होती बारिश, पहाड़ियों से दरकते पत्थर और लुढ़कता मलबा, मानों जान लेने को आतुर हो। टेंटों के आसपास आवारा घूम रहे खच्चर और कुत्तों का हमला कभी भी जान पर भारी पड़ सकता था।
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इन कठिन परिस्थितियों में जब भी मंदिर परिसर से काफी दूर लगे हमारे टेंट के इर्द-गिर्द बीएसएनएल के नेटवर्क की एक डंडी भी मोबाइल पर दिखाई पड़ती तो सीधे घर का नंबर डायल होता। सिग्नल गायब हुआ तो फिर करना पड़ता था लंबा इंतजार। दो दिन पहले ही मेरी बमुश्किल अपने घर देहरादून कुछ सेकंड ही बात हो पाई।

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मैं इतना ही कह पाया कि मैं यहां ठीक हूं। अब बाबा केदार की कृपा से हम आप लोगों के बीच में हैं। परिजनों को भी वापस लौटने की खबर दे दी है। ये शब्द केदारनाथ से मंगलवार को हेलीकॉप्टर से वापस आए 55 लोगों में शामिल डाक्टर प्रदीप उनियाल थे।
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उनकी सूजी आंखें, ठंड से लाल हुआ चेहरा और कानों के नीचे से उतरती त्वचा की परत बयां कर रही थी कि केदारनाथ में हालात अब भी ठीक नहीं हैं।

छह दिन और छह रातें गुजार कर लौटे इन अधिकारियों और कर्मचारियों ने जो बताया, उसने रोंगटे खड़े कर दिए। उनकी मानसिक स्थिति बता रही थी कि मलबे के ढेर में पटा मंदिर और केदारघाटी का खौफनाक मंजर उनके दिलो-दिमाग में अब भी घूम रहा है।

डर से सांसें थम जाती थीं
दल में शामिल देहरादून के सीओ (ट्रैफिक) स्वप्न किशोर सिंह का कहना था कि रात में एक घंटी वाला खच्चर टेंट के सामने हिनहिनाता था, तो डर से सांसें थम जाती थी। न जाने कब टैंट पर हमला बोल दे। केदारनाथ में तीसरे दिन भी जब बारिश नहीं थमी तो वापसी की उम्मीद टूटने लगी थी।

टीम लीडर अपर पुलिस अधीक्षक देवेंद्र पिंचा ने बताया कि मलबे के ढेर में पटे केदारनाथ में जहां दुर्गंध और बड़ी मक्खियां लगातार घूम रही हैं, वहां बिताए छह दिन और छह रातें उन्हें अपने जीवन में हमेशा याद रहेंगे।

टेंट पर जानवरों का हमला मुश्किलें पैदा कर रहा था। एक खच्चर ने तो हमारा मैगी से भरा पतीला और रात का बचा कुछ खाना भी गिरा दिया था। वहां हालात सामान्य बनाने में मैन पावर के साथ मशीनों की मदद ली जानी चाहिए।

डा. विमलेश जोशी ने बताया कि केदारनाथ में दस कदम चलने पर ही धौंकनी की तरह सांस फूल रही थी। ऐसे में डेढ़ किमी दूर से पानी जुटाना मुश्किल हो रहा था। वहां दुकानों में लाखों का सामान अब भी है। लेकिन टूटे होटल, लॉज और दुकानें खतरे का सबब बनी हुई हैं। हालात इस कदर थे कि यहां हल्की सी चूक भी जीवन पर भारी पड़ सकती है।

पानी की बड़ी समस्या
एनडीआरएफ के ग्रुप कमांडेट गोपी चंद ने बताया कि मुश्किल हालातों में सभी ने टीमवर्क और एकजुटता के साथ कार्य किया। भोजन की कमी नहीं थी, लेकिन पानी की बड़ी समस्या थी। टीम ने 16 शवों को निकाल कर टीम ने उनका अंतिम संस्कार किया। लेकिन अब भी मलबे के ढेर में कई शव दबे हो सकते हैं।
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