पति-पत्नी के रिश्तों में दूरी पैदा कर रहा मम्मियों का हस्तक्षेप
कुछ मम्मियों के अनावश्यक हस्तक्षेप से दंपतियों के बीच अलगाव बढ़ रहे हैं। बेटा हो या बेटी, दोनों ही पक्षों में मम्मियों का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है कि दंपति चाहते हुए भी एक-दूसरे से बात नहीं कर पा रहे हैं। मम्मियां इसे अपनी नाक की लड़ाई बनाते हुए आगे हो जा रही हैं। यह निष्कर्ष महिला हेल्पलाइन में दंपतियों के विवादों के निपटारे के दौरान निकला है।
पिछले तीन महीनों में करीब 30 ऐसे मामले आए हैं, जिनमें कई कोशिशों के बावजूद मम्मियां बच्चों की गृहस्थी दोबारा नहीं बसने दे रही हैं। ऐसे मामलों को बृहस्पतिवार को बैठने वाले विशेष पैनल के सदस्य देख रहे हैं।
मम्मियों को बाहर कर दंपतियों से बात की जा रही है। लेकिन उनकी जुबां पर भी यही है कि जैसा मम्मी चाहेगी, वैसा ही करेंगे। यहां हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि यह निष्कर्ष केवल इन्हीं मामलों से जुड़ी मम्मियों को लेकर निकाला गया है, यह सभी पर नहीं लागू होता।
कुछ मामले जहां मम्मियां नहीं होने दे रहीं पैचअप
ज्यादा हस्तक्षेप पति पत्नी को दूर कर रहा है।
केस नंबर-1
धर्मपुर निवासी कल्पना (काल्पनिक नाम) की शादी को पांच साल हो गए। पति-पत्नी के बीच अक्सर छुटपुट लड़ाई हो जाती थी। एक बार कल्पना की किसी बात पर सास से बहस हो गई। झगड़ा इतना बढ़ा कि कल्पना पहले मायके और फिर अपनी मम्मी के साथ महिला हेल्पलाइन पहुंच गई। हेल्पलाइन में मम्मियों का खूब झगड़ा हुआ। आखिरकार काउंसलर ने मम्मियों को काउंसलिंग में आने से मना तो कर दिया, लेकिन अब भी कल्पना और उसके पति यही कहते हैं कि जैसा मम्मी कहेंगी वैसा ही होगा।
केस नंबर-2
चकराता रोड निवासी आशा (काल्पनिक नाम) की शादी को चार साल हो गए। आशा को अपने पति से कोई शिकायत नहीं है। उसे परेशानी है अपनी सास की टोका-टाकी से। आशा भी अपनी मम्मी के साथ ही हेल्पलाइन जाती है। उसके पति का कहना है कि जब तुम मम्मी को लाओगी तो मैं भी अपनी मम्मी के साथ रहूंगा और उन्हें साथ लाऊंगा। हेल्पलाइन में भले ही वह दोनों कुछ न बोलते हों, लेकिन उनकी मम्मियां भिड़ जाती हैं। काउंसलर्स ने इनसे बात की तो इन्हें आपस में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन मम्मियां एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं।
इनका है कहना
मम्मियों के हस्तक्षेप की वजह से दंपतियों के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि काउंसलिंग के समय सिर्फ दंपति को ही कमरे में बैठाया जाता है। परिवार के अन्य लोगों को बाहर बैठने को कह दिया जाता है। अक्सर यहां मम्मियां आपस में लड़ बैठती हैं, जिसे देख लगता है कि यह अपने बच्चों का परिवार बिगाड़ने की जगह बसाने की कोशिश करतीं तो अच्छा रहता।
-संध्या रानी, प्रभारी, महिला हेल्पलाइन