पहाड़ के लोगों की मुश्किलें कम नहीं हो रही है। विपदा की मार झेल रहे उत्तराखंड के लोगों को बंदर, जंगली सुअर और भालू के उत्पात और आतंक को भी साथ-साथ सहना पड़ रहा है। पहले ही भूस्खलन, बाढ़ ने खेती को बर्बाद कर दिया है। रही सही कसर जंगल के इन जीवों ने पूरी कर दी है।
जंगलों से निकलकर अब बंदर और जंगली सुअर बस्तियों की तरफ आने लगे है। ये खेतों को नष्ट कर देते हैं और बंदर पेड़ों में चढ़कर फलों को बर्बाद कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ गांव में भालू का आतंक भी देखा गया है।
गांवों में ही नहीं श्रीनगर, नई टिहरी, गोपश्वर, पौड़ी, उत्तरकाशी आदि शहरों में भी बंदर घनी बस्तियों में आने में हिचकते नहीं है। वह खेतों में पौधों को उखाड़ देते हैं और खीरा, भुट्टा आदि खा देते हैं साथ ही सेब, आडू, आम, खुमानी की फसल को बर्बाद कर देते हैं। बंदरों का उत्पात सब्जियों पर भी होता है। घर आंगन में लगाई गई सब्जियों को भी यह अपनी उछल-कूद से बर्बाद कर देते हैं।
कुंभ के मेले में हरिद्वार से पहाड़ों में बंदर छोड़े गए। हरिद्वार में रहने वाले यह बंदर पहले से ही आबादियों में रहने के आदी थे। इसलिए पहाड़ के जंगलों से बस्तियों के बीच आना इन्हें मुश्किल नहीं लगा। यही कारण है कि श्रीनगर के डाक बंगला, पौड़ी के कंडियोला, उत्तरकाशी के जोशियाड़ा, टिहरी के बौराड़ी, लंबगांव जैसे इलाकों में बंदरों ने अपना आतंक जमाया हुआ है।
हालत यह है कि कई जगह पर लोगों ने कीचन गार्डन या बागवानी करना बंद कर दिया है। बंदरों केवल छोटी खेती को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि में घरों के रखे सामान को भी उठा रहे हैं। बंदरों का साहस इतना है कि कुछ घरों में इन्होंने ड्राईंग रूम व किचन में भी अधिकार जमाया है। बड़ी मुश्किल से इन्हें निकाला जाता है।
बच्चों में इनका खौफ पसरा रहता है। टिहरी झील बनने के कारण भी बंदर टिहरी के कई गांवों की तरफ आ गए। इससे लोगों की मुश्किलें काफी बड़ी। लोगों ने हर जगह अपने-अपने स्तर पर शिकायतें भी की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। बंदरों की तरह लंगूरों ने भी खूब उत्पात मचा रखा है। बंदरों पर नियंत्रण रखने वाले लंगूर खुद में नियंत्रित नहीं हो पाते।
उत्तरकाशी के रैथल-बार्सू क्षेत्र में केवल सेब के बागान केवल लंगूरों के चलते बर्बाद हुए। हर्षिल में भी यही दिक्कत आ रही थी। लंगूर सेबों की छाल उदेड़ कर खाते हैं। यह मीठी छाल होती है। इन बंदर और लंगूर को पकडऩे के लिए किसी तरह का सुनियोजित अभियान नहीं चला है। पर्यावरणविद् और मानवधिकार संगठनों के डर से भी कोई कदम नहीं उठाया जाता है। इस दिक्कत को केवल पहाड़ों की आम जनता ही झेल रही है।
इधर, कुछ वर्षों में जंगली सुअरों ने फसलों को बर्बाद किया है। जंगलों से लगे गांवों में ग्रामीणों के लिए जंगली सुअरों से अपनी फसल को बचाना कठिन हो गया है। इस बार आपदा की तबाही में खेती पहले ही बर्बाद हो चुकी है। रही सही खेती को बर्बाद करने के लिए वन्य जीव तैयार बैठे हैं। चमोली में माल्टे की फसल और टिहरी के कुछ इलाकों में अदरक में भी वन्य जीवों के कारण नुकसान हुआ है।
पहले ही मुसीबत में पड़े गांव के लोगों के पास इस दिक्कत को झेलना कठिन होगा। वहीं भालू की नजर केवल मक्का की खेती पर रहती है, लेकिन हाल के वर्षों में मक्के की खेती होती गई है। भालू को लेकर असली दिक्कत हमला करने की है। कई गांव में भालू के हमले बढ़े हैं।
उत्तराखंड में खेती और बागानों का रकबा पहले ही काफी कम होता जा रहा है। बढ़ती शहरीकरण की प्रवृत्ति और खेती के घटते मोह के कारण कृषि और बागान क्षेत्र सिमटता जा रहा है, जो बचा है वह भी अलग-अलग कारणों से नष्ट हो रहा है।