आपदा की मार झेल रहे उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग और चमोली जिले का दौरा कर लौट रही सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटेकर ने आपदा को प्राकृतिक कम, लेकिन मानव जनित अधिक बताया है।
पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि प्रभावित ग्रामीणों की आजीविका तथा विस्थापन के लिए सरकार को राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
गढ़वाल मंडल विकास निगम के यात्री विश्राम गृह में पत्रकारों से बातचीत करते हुए वयोवृद्ध समाज सेवी मेधा पाटेकर ने कहा कि उत्तराखंड के 60 प्रतिशत लोगों की आजीविका का साधन पर्यटन और तीर्थाटन है, जो बुरी तरह से प्रभावित हो गया है।
जल विद्युत परियोजनाएं जिम्मेदार
मेधा पाटकर ने कहा कि उत्तराखंड में बेतरतीब ढंग से बन रही अंधाधुंध जल विद्युत परियोजनाओं तथा अन्य निर्माण कार्यों के मलबे ने ही इस आपदा में सबसे अधिक कहर ढाया है।
पाटकर ने कहा कि गंगा तथा भागीरथी को 30-30 किमी. के जलाशयों में तब्दील किया गया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के लोगों ने नदियों को सुरक्षित रखा जबकि यहां की सरकारें राज्य को एक भूखंड मानकर इसे बेचने पर तुली हैं।
अब राज्य के लोगों पर इस कदर आपदा आई है, तो यहां के लोगों के विस्थापन तथा आजीविका के लिए नियमों में ढिलाई बरतकर बसाहतें होनी चाहिए। गाद नदियां ला रही हैं, मलबा परियोजनाओं से आ रहा है फिर भी शासकीय संस्थाओं और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी इसकी सुध नहीं ली। इसलिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रभावितों को दें उचित सहायता
नर्वदा बचाओ अभियान की नेत्री मेधा पाटेकर ने बुधवार को चमोली में आपदा प्रभावितों से मुलाकात की। उन्होंने चमोली के एसडीएम अवधेश कुमार सिंह को प्रभावितों की उचित देखरेख और सहायता देने की अपील की।
पाटेकर ने कहा कि अलकनंदा नदी पर निर्मित विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना बिना जांच-परख के बनाई गई है। इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी भी सरकार नहीं चेती तो बेकुसूर यूं ही मारे जाते रहेंगे।