प्राचीन काल से श्रीनगर व आसपास का क्षेत्र पौराणिक व ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी की उपेक्षा व रखरखाव के अभाव के कारण जर्जर स्थिति में पहुंच चुके हैं। यात्रा मार्ग पर होने के बावजूद भी प्रसिद्ध स्थल पर्यटकों की पहुंच से दूर हैं। विडंबना तो यह है कि अब स्थानीय निवासी भी इन्हें भुला चुके हैं।
सोम का मांडा व देवलगढ़ मंदिर समूह
देवलगढ़ में राजशाही को 1320 सक 1517 तक माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार राजा अजयपाल ने देवलगढ़ को अपनी राजधानी बनाया था। पांच वर्षों तक यहां रहने के बाद राजधानी को श्रीनगर स्थानांतरित कर दिया था। राजशाही के इसी काल में यहां सोम का मांडा (न्याय की गद्दी) का निर्माण कराया गया। इतिहासकारों का मानना है कि यह न्याय के मंत्र हैं। देवलगढ़ मंदिर समूह भी इसी दौरान के हैं। सोम का मांडा का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है।
गोरखनाथ गुफा
नाथ संप्रदाय के संस्थापक गुरु गोरखनाथ की तपस्थली सरकारी उपेक्षा के चलते जीर्णशीर्ण स्थिति में है। नाथ संप्रदाय के मंगलानंद पटवाल बताते हैं संवत 1734 में नाथ संप्रदाय के संस्थापक गुरु गोरखनाथ ने इस गुफा में तपस्या की थी। गुफा के अंदर गोरखनाथ की प्रतिमा स्थापित है। यह स्थान नाथ संप्रदाय के लोगों के लिए तीर्थ स्थल है। यहां नाथ संप्रदाय के लोगों की छह समाधियां भी हैं।
दक्षिण श्रृगेरीमठ (केशोराय मठ)
मान्यता के अनुसार आदिगुरु शंकराचार्य ने 365 मठों का निर्माण किया था। केशोराय मठ उनमें से एक है। मंदिर का पुराना नाम आदि गुरु शंकराचार्य मठ था। बाद में इसका नाम मठ के पहले महंत केशोराय के नाम पर किया गया। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण 1625 ई. में हुआ। इसकी निर्माण शैली 7वीं शताब्दी के पंरपरा में निर्मित मठों एवं मंदिरों की दिखती है। मंदिर वर्ष 2013 की आपदा में क्षतिग्रस्त हो गया था। नदी के बढे़ जलस्तर से मंदिर का निचला हिस्सा बह गया था। प्रशासन की उपेक्षा के चलते मंदिर ध्वस्त हो गया।