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दर्शकों को झकझोर गया ‘मेरा राजहंस’

Thu, 03 Mar 2016 10:43 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,कोटद्वार
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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में चल रहे जश्न-ए-विरासत नाट्य महोत्सव का बृहस्पतिवार को समापन हो गया। अंतिम दिन सुधीर विद्यार्थी द्वारा लिखित हिंदी नाटक ‘मेरा राजहंस’ की मार्मिक प्रस्तुति देख दर्शक भावुक हो गए।
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 कलाकारों के सफल अभिनय पर तालियों की गड़गड़ाहट से प्रेक्षागृह गूंज उठा। यह प्रस्तुति गढ़वाल विवि छात्र महासंघ के दिवंगत सचिव आयुष नेगी को समर्पित थी।

समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि विधायक संसदीय सचिव गणेश गोदियाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन से स्थानीय प्रतिभाओं को आगे आने का मौका मिलता है।
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विमर्श नाट्य संस्था की ओर से प्रस्तुत सोलो नाटक ‘मेरा राजहंस’ में कलाकार मुकेश मुनि ने डेढ़ घंटे तक विभिन्न किरदारों पर एकल अभिनय किया। राजेश कुमार के निर्देशन में तैयार यह नाटक समाज की संवेदनहीनता पर करारी चोट करता है।

 प्रस्तुति में दिखाया गया है कि कलाकार संवेदनहीन समाज में अपने पुत्र चंदन के इलाज के लिए किस प्रकार कदम दर कदम जूझता है। एक दुर्घटना में पुत्र की मौत के बाद जिस पीड़ा और निराशा को वह झेलता है, उसे भी चित्रित किया गया है।

आयोजन समिति के सचिव परवेज अहमद ने आभार प्रकट किया। कार्यक्रम में कांग्रेस के प्रदेश महासचिव राजपाल बिष्ट, युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव मनोज कुकरेती, ब्लाक प्रमुख पोखड़ा सुरेंद्र रावत, जीएमवीएन निदेशक विजयपाल रावत आदि मौजूद थे।

दर्शको को बांधने में सफल रहा नाटक
‘मेरा राजहंस’ का एकल मंचन एक बेहतरीन प्रस्तुति है। नाटक की विषय वस्तु अत्यंत सरल है। नाटक के सोलो कलाकार मनीष मुनि का जबरदस्त अभिनय डेढ़ घंटे तक दर्शकों को बांधने में सफल रहा।

नाटक का संपूर्ण घटनाक्रम मूक बधिर बच्चे के पैदा होने पर माता-पिता की खुशी, बड़ा होने पर बच्चे के मूक बधिर होने की जानकारी होना, उसके इलाज में एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद बच्चे का इलाज न हो पाना और फिर एक सड़क दुर्घटना में मारा जाना पूरे नाटक को मार्मिकता प्रदान करने में प्रभावी साबित रहा।

 नाटक के मुख्य संवाद
-सरकार ऐसे विद्यालयों में स्पीच थेरेपी की व्यवस्था क्यों नही करती।
-मेरा बेटा हार्ड हियरिंग के कारण ऐसा है।
-विकलांग वर्ष आया और चला भी गया।
-पर सरकार को ऐसे कार्यो के लिए सोचने की फुर्सत कहां है।
-सड़क जो मानव सभ्यता को आगे की ओर ले जाने के लिए बनी एकाएक श्मशान भूमि में तब्दील हो गई।

मंच पर
सभी पात्रों में मनीश मुनि।
पर्दे के पीछे
प्रकाश (विपिन गौतम), संगीत (अनमोल), निर्देशन (राजेश कुमार), सेट डिजायन(प्रेममुनि)

लेखक सुधीर विद्यार्थी के जीवन की सत्य घटना पर आधारित है नाटक
नाटक के लेखक सुधीर विद्यार्थी ने यह नाटक अपने अपने जीवन की घटना पर लिखा है। लेखक के 12 वर्षीय मूक बधिर पुत्र की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो जाती है। लेखक ने बेटे के इलाज और सड़क दुर्घटना में हुई बेटे की मौत के मार्मिक पहलुओं को नाटक में संजोया है।
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