तीन साल पूर्व केदारनाथ जल प्रलय से तबाह हुए आईटीआई (राजकीय औद्योगिक एवं प्रशिक्षण संस्थान) और औद्यानिक प्रशिक्षण एवं परीक्षण प्रक्षेत्र की हालत में कोई सुधार नहीं हो पाया है। आईटीआई भवन निर्माण प्रक्रिया फुटबाल की तरह एक पाले से दूसरे पाले जा रही है। वहीं, औद्यानिक प्रक्षेत्र मेें इस्टीमेट से आगे बात नहीं बढ़ पाई है।
16/17 जून को अलकनंदा की बाढ़ में आईटीआई के आवासीय व अनावासीय भवन और उद्यान विभाग की नर्सरी जलमग्न हो गई थी। तब से आईटीआई की कक्षाएं लोअर बाजार श्रीनगर स्थित पुरानी आईटीआई में चल रही हैं। आपदा में में डूबे आईटीआई भवनों से न तो मलबा हटाया जा सका है और न ही नए भवन का निर्माण शुरू हो पाया।
आईटीआई की वर्कशॉप के अंदर वाहन और मशीन तीन साल से मलबे में दबे हैं। लगभग 7-8 माह पूर्व आंदोलनकारियों ने सांकेतिक रुप से मलबे को हटाया भी था, लेकिन सरकार की नींद नहीं टूटी। यहां बता दें कि आईटीआई के नए भवन के लिए विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग से भवन का निर्माण किया जाना है।
पूर्व में शासन स्तर से तय किया गया कि लोअर बाजार में आईटीआई का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए टेंडर भी हो गए थे। लेकिन प्रस्तावित स्थल के समीप से ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलमार्ग प्रस्तावित है, इसलिए पुन: पुराने स्थान पर ही भवन निर्माण का निर्णय लिया गया, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।
वहीं, वर्ष 1972 में स्थापित उद्यान विभाग की नर्सरी के कुछ ही हिस्से में पौध तैयार की जा रही हैं। कार्रवाई के नाम पर अभी तक दो बार शासन को इस्टीमेट जा चुका है। साल दर साल मरम्मत की लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन मरम्मत के लिए धनराशि नहीं मिल पा रही है। नदी की बाढ़ से आए मलबे ने प्रक्षेत्र की छह फीट ऊंची सुरक्षा दीवार को तोड़ दिया था। आपदा से बचे पेड़-पौधे भी सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। नर्सरी अतिक्रमण की चपेट में है।
आईटीआई का निर्माण आपदा प्रभावित जमीन में होना है, लेकिन इस संबंध में शासन से निर्देश आने हैं। शासन स्तर पर कार्रवाई जारी है।
-संजीव कुमार, प्रधानाचार्य आईटीआई श्रीनगर