कोटद्वार। पौड़ी गढ़वाल में मकर संक्रांति पर होने वाला गेंद मेला (गिंदी कौथिग) का अलग ही महत्व है। गढ़वाल में यह मेला थलनदी, डाडामंडी, देवीखेत, दालमीखेत, मवाकोट, सांगुड़ा बिलखेत आदि कई स्थानों पर होता है, लेकिन थलनदी और डाडामंडी का गेंद मेला सबसे प्रसिद्ध है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार थलनदी से ही गेंद मेले की शुरुआत हुई थी। थलनदी और डाडामंडी के गेंद मेलों को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। दोनों गेंद के मेले एक मल्ल युद्ध की तरह दो पट्टी के लोगों के बीच बीच खेला जाता है। इस खेल का न तो कोई नियम है और न ही खिलाड़ियों की संख्या ही निर्धारित है। मेले का आकर्षण एक चमड़े की गेंद (वजन करीब 20 किलो) होती है, जिसमें कड़े लगे होते हैं। यह खेल खुले खेतों में खेला जाता है। दोनों पट्टियों (इलाके) के लोग निर्धारित स्थान पर ढोल-दमाऊ और नगाड़े बजाते हुए अपने-अपने क्षेत्र के ध्वज लेकर एकत्र होते हैं।
खेल शुरू होने से पूर्व पांडव नृत्य का आयोजन होता है। गेंद को लपककर अपने क्षेत्र की सीमा में फेंकने के लिए छीना-झपटी शुरू होती है। सबका लक्ष्य होता है गेंद को छीन कर अपनी सीमा में ले जाना, वही विजेता होता है। इसको खेलने वालों के साथ देखने वाले भी भरपूर उत्साहित रहते हैं। थलनदी में जहां अजमीर और उदयपुर पट्टियों के बीच गेंद खेली जाती है, वहीं डाडामंडी में लंगूर और भटपुड़ी पट्टियों के बीच गेंद खेली जाती है।
महाभारत काल से जुड़ा है मेले का इतिहास
थलनदी गेंद मेले का संबंध महाभारत काल से है। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय महाबगढ़ी में व्यतीत किया था। इसी दौरान कौरव सेना उन्हें ढूंढते हुए यहां पहुंच गई और पांडवों और कौरवों में मल्लयुद्ध हुआ। यह मेला उसी घटना की याद में मनाया जाता है। वहीं, कुछ लोगों की मान्यता है कि यमकेश्वर ब्लाक के अजमीर पट्टी के नाली गांव के जमींदार की गिदोरी नामक लड़की का विवाह उदयपुर पट्टी के कस्याली गांव में हुआ था। पारिवारिक विवाद होने पर गिदोरी घर छोड़कर थलनदी आ गई। नाली गांव के लोग गिदोरी को मायके ले जाने लगे, तो कस्याली गांव के लोग उसे वापस ससुराल ले जाने का प्रयास करने लगे। इस संघर्ष में गिदोरी की मौत हो गई। तब से थलनदी में दोनों पट्टियों में गेंद के लिए संघर्ष होता है।