यदि निजी या सरकारी पैथोलॉजी लैब की ओर से यह बताया गया है कि आपको डेंगू हैं, तो घबराए नहीं। राजकीय मेडिकल कालेज श्रीनगर की माइक्रो बायोलॉजी लैब में एलाइजा (एंजाइम लिंक्ड इम्युनो सोरवेंट एस्से) परीक्षण अवश्य कराएं। एलाइजा जांच की रिपोर्ट के बाद ही डेंगू की प्रमाणिक पुष्टि हो रही है।
स्थिति यह है कि अन्य लैब से रेपिड टेस्ट में पॉजीटिव पाए गए 60 केस में से सिर्फ तीन में ही डेंगू के लक्षण पाए गए हैं। चिकित्सकों का मानना है कि बुखार और बदन दर्द अन्य रोगों में भी हो सकता है। सभी को डेंगू बताना उचित नहीं है।
इन दिनों अस्पतालों में बुखार, सिर दर्द और बदन दर्द से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ रही है। मच्छरों से फैलने वाले डेंगू के भय से मरीज सरकारी और निजी पैथोलॉजी लैब में अपना रक्त परीक्षण करवा रहे हैं। इन प्रयोगशालाओं में परीक्षण के नाम पर रेपिड टेस्ट करवाया जा रहा है, जो सामान्यतया एक कार्ड है, जिस पर रक्त की बूंद डालने पर यदि रंग बदल जाए, तो पॉजीटिव मान लिया जाता है। ऐसे ही रेपिड टेस्ट में पॉजीटिव निकले लगभग 60 मरीज डेंगू के पुष्टि के लिए मेडिकल कालेज पहुंचे।
कालेज में इन सभी मरीजों का एलाइजा टेस्ट कराया गया। इसमें सिर्फ तीन में ही डेंगू की पुष्टि हुई। यानी कि पांच फीसदी ही डेंगू के मरीज निकले। कालेज के माइक्रो बायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. शेखर पाल का कहना है कि एलाइजा टेस्ट से ही डेंगू की पुष्टि हो पाती है। रेपिड टेस्ट में सही नतीजे नहीं निकल पाते हैं। जरूरी नहीं है कि यदि किसी को बदन दर्द या तेज बुखार हो रहा तो उसको डेंगू हो।
यह है एलाइजा टेस्ट
यह परीक्षण सिर्फ माइक्रो बायोलॉजी लैब में होता है। निजी लैब में यह परीक्षण 1000 से 1500 रुपये के बीच होता है। जबकि मेडिकल कालेज में निशुल्क होता है। इस टेस्ट में रोगी के रक्त के नमूने लेकर मशीन में परीक्षण किया जाता है। मशीन की रीडिंग को चिकित्सक गणितीय फार्मूले से कैलकुलेट कर डेंगू की पुष्टि की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में पांच घंटे से ऊपर का समय लग जाता है।
डेंगू से पीड़ित तीनों मरीज लौटे हैं मैदानी क्षेत्रों से
श्रीनगर। जिन तीन मरीजों में डेंगू की पुष्टि हुई है, उनमें दो पुरुष और एक महिला है। तीनों लोग कुछ समय पूर्व मैदानी क्षेत्रों से यात्रा कर लौटे थे। डा. शेखर पाल का कहना है कि अभी तक डीईएन 2 (बुखार व दर्द की शिकायत) से पीड़ित मरीज आए हैं।
यदि किसी में डेंगू के लक्षण पाए जाते हैं, तो अलग कक्ष (आइसोलेट) में रखना चाहिए, ताकि उसको मच्छर नहीं काट सके, क्योंकि संक्रमित व्यक्ति को काटने वाले मच्छर यदि सामान्य आदमी को काट ले, तो उसे भी डेंगू होने का खतरा रहता है।