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वन विभाग पर 1012 ग्रामीणों का

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कोटद्वार। वन विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली का खामियाजा पौड़ी जिले के चार विकासखंड के हजारों पशुपालकों को भुगतना पड़ रहा है। लैंसडौन वन प्रभाग के जंगली जानवरों को जंगल में रोकने की नाकामयाबी के चलते जंगली जानवर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के पालतू जानवरों को मार रहे हैं। ग्रामीण अपने जानवरों की मौत के बाद वन विभाग से मुआवजे की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा रहा है। ग्रामीणों का वन विभाग पर 85 लाख रुपये का मुआवजा बकाया है।
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लैंसडौन वन प्रभाग के 43327.60 हेक्टेयर वन भूमि की सीमा से दुगड्डा, जयहरीखाल, यमकेश्वर और द्वारीखाल ब्लाक के ग्रामीण क्षेत्र सटे हुए हैं। वन क्षेत्र में जंगली जानवरों के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था नहीं होने के कारण वे आबादी में धमककर ग्रामीणों के पालतू जानवरों को मार रहे हैं। वर्ष 2015 से अभी तक लोगों को उनके पालतू जानवरों का मुआवजा नहीं दिया गया है। करीब 1012 लोगों का वन विभाग पर 85 लाख रुपये का मुआवजा बकाया है। लोग पिछले तीन वर्षों से मुआवजे के लिए विभाग के चक्कर काटने को मजबूर हैं। इससे लोग पलायन को मजबूर हैं।
विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले तीन वर्षों में जंगली जानवरों द्वारा करीब 115 मवेशियों को अपना शिकार बनाया है। वन विभाग ने खेती का मुआवजा तो चुका दिया, लेकिन पालतू जानवरों के मुआवजे के लिए विभाग के पास बजट नहीं है।
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क्या कहते हैं अधिकारी
यह बात सही है कि वर्ष 2015 से ग्रामीणों को उनके पालतू पशुओं का मुआवजा नहीं मिल सका है। बजट के अभाव में ऐसा हो रहा है। शासन से इसके लिए एक करोड़ रुपये की डिमांड की गई है। बजट आते ही सभी को उनके जानवरों का मुआवजा दिया जाएगा।
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-संत राम, डीएफओ लैंसडौन वन प्रभाग
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