कोटद्वार। एक तरफ सरकार पलायन को रोकने के लिए पहाड़ों के विकास के दावे कर रही है। वहीं द्वारीखाल ब्लाक का एक गांव ऐसा भी है, जहां लोगों के लिए आजादी के 70 वर्ष बाद भी किसी प्रकार की पेयजल योजना नहीं बनी। इसके चलते गांव के 32 परिवार पलायन कर चुके हैं। बचे हुए लोग दो किमी की खड़ी चढ़ाई पर सिर पर पानी ढोकर जीवन यापन करने को मजबूर हैं।
उत्तराखंड राज्य निर्माण के सत्रह वर्षों में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन लैंसडौन-ऋषिकेश राजमार्ग पर स्थित बलूनी गांव की किसी ने सुध नहीं ली। जनप्रतिनिधि आते हैं पानी का अश्वासन देते हैं, लेकिन कोई भी जनप्रतिनिधि यहां के लिए पेयजल योजना तो छोड़ एक हैंडपंप तक की व्यवस्था नहीं कर सका।
ग्रामीण अजय बलूनी, नरेश नैथानी व अंजू नैथानी ने बताया कि पानी की किल्लत के कारण उन्होंने मवेशियों को पालना भी छोड़ दिया है। बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं। ऐसे में बच्चों का अधिकतर समय पानी ढोने में व्यतीत हो रहा है। पेयजल आपूर्ति के संबंध में वे पूर्व विधायक विजया बड़थ्वाल से लेकर वर्तमान विधायक ऋतु खंडूरी को अपनी समस्या से अवगत करा चुके हैं, लेकिन आज तक उनकी समस्या का निराकरण नहीं हो पाया है।
गांव में शौचालय, पानी के बिना बने हैं शोपीस
एक ओर केंद्र और प्रदेश सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत सभी गांवों में शौचालय बनाने की बात कर रही है, लेकिन बिना पानी के शौचालय और स्वच्छता की कल्पना नहीं की जा सकती।
क्या कहते हैं अधिकारी
बलूनी गांव में पानी नहीं पहुंचने की जानकारी नहीं है। कुछ गांवों को भैरवगढ़ी पंपिंग योजना से जोड़ने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। बलूनी गांव को उसमें शामिल करने का प्रयास किया जाएगा।
-बाबू राम, ईई जलनिगम कोटद्वार
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