केदारनाथ यात्रा के लिए इस साल दुखद भरा रहा। जलप्रलय में हजारों की जान गई, वहीं आपदा ने व्यवसाय की रीढ़ तोड़ कर रख दी। भले ही सरकार ने दोबारा यात्रा शुरू कर दी थी, लेकिन स्थिति अभी भी सामान्य नहीं हो पाई है।
कपाट खुलने से पूर्व चर्चाओं में रहा
इस वर्ष भी मंदिर के कपाट खुलने से पूर्व केदारनाथ चर्चाओं में आ गया था। गत वर्ष हाईकोर्ट की ओर से सफाई मामले में सख्त कदम उठाने के बाद घोड़े-खच्चरों पर प्रतिबंध लग गया था, जिससे इस वर्ष जिला प्रशासन ने हाईकोर्ट में हलफनामा देकर घोड़े-खच्चरों का संचालन अपने हाथ में ले लिया था। इसके विरोध में कपाट खुलने से एक दिन पूर्व 13 मई से जिला पंचायत सदस्य वीर सिंह बुडेरा आमरण अनशन पर बैठ गए। प्रशासन की ओर से उनको उठाने पर दूसरे सदस्य अनशन पर बैठ गए।
अनशन पर बैठे थे लोग
14 मई को मंदिर के कपाट खुलने पर यात्रा शुरू हो गई। जून में ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू होने पर यात्रा बढ़ने लगी। 11 जून से सीटू ने घोड़े-खच्चर मजदूरों की हड़ताल करवा दी। तीर्थयात्रियों को हड़तालियों ने आधे रास्ते में उतार दिया। यात्रियों के साथ अभद्रता की गई। 12 जून को मजदूरों की हड़ताल स्थगित हुई, तो हवाई सेवा और केदारनाथ विकास प्राधिकरण के विरोध में जिला पंचायत केशव तिवारी सहित तीन लोग धाम में अनशन पर बैठ गए।
15 जून को हुआ था मौसम खराब
14 जून को अनशनकारी हेलीपैड पर बैठ गए, जिससे हेली सेवाएं बंद हो गई। इसी बीच 15 जून से मौसम खराब होने लगा। 11 जून से शुरू हुए आंदोलनों से यात्रा प्रभावित हो गई। 16 जून को भारी बारिश के कारण प्रशासन ने यात्रा रोक दी। तमाम गतिरोधों के कारण यात्री जगह-जगह फंस गए।
हजारों की जान चली गई
16 जून की रात लगभग नौ बजे और 17 जून की सुबह लगभग सात बजे आए जलजले ने धाम को तबाह कर दिया। केदारनाथ से जिला मुख्यालय तक नदियों में आई बाढ़ ने सैकड़ों लोगों को बेघर कर दिया। सैकड़ों दुकानें बह गई। हजारों लोगों की जान चली गई। आपदा के कारण केदारनाथ मंदिर बंद हो गया। 11 सितंबर को प्रदेश सरकार ने केदारनाथ मंदिर में दोबारा पूजा-अर्चना शुरू कराई। पांच अक्तूबर से केदारनाथ यात्रा भी शुरू हो गई।