एक ओर जहां ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों का पिघलना वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है, वहीं कराकोरम ग्लेशियर से जुड़ी खबर सुखद है।
यह बढ़ रहा है जबकि दूसरे हिमालयी ग्लेशियर औसतन 20 मीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से घट रहे हैं। शोध इसकी पुष्टि कर चुके हैं।
देहरादून स्थित वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान के वैज्ञानिकों ने इस सिलसिले में विदेशी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर शोध किया है। इसके मुताबिक कराकोरम स्थित शाइयोक वैली के ग्लेशियरों के 1989 से 2002 के बीच 8.2 वर्ग किलोमीटर, जबकि 2002 से 2011 तक 5.6 वर्ग किलोमीटर बढ़ चुका है।
जबकि पर्यावरणीय हालात एक जैसे हैं और ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति भी, इसके बावजूद कराकोरम की वृद्धि बताती है कि इस दिशा में और उन्नत शोध की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि शोध के नतीजे बाकी ग्लेशियरों से जुड़े अध्ययनों में भी मदद करेंगे।
हिमालयी ग्लेशियरों पर शोध करने वाली टीम में स्विट्जरलैंड, जर्मनी के साथ वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डा. डीपी डोभाल, डी श्रीवास्तव और बी प्रताप शामिल हैं। उन्होंने करोकोरम समेत अन्य ग्लेशियरों पर अपना रिसर्च पेपर ‘हीटरोजेनेटी इन ग्लेशियर रिस्पांस फ्राम 1973-2011 इन शायओक वैली’ भी प्रस्तुत किया है। अपने अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने शायओक के 1605 समेत कुल 2123 ग्लेशियरों पर शोध किया।
क्षेत्र की भौगोलिक खासियत भी मददगार
कराकोरम पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र का ग्लेशियर है। इस क्षेत्र की विशेषता है कि यहां बड़े ग्लेशियर होते हैं। यह क्षेत्र समर मानसून से अप्रभावी रहता है। बर्फ अधिक गिरती है और ढाल कम होती है। इसके साथ ही बर्फ की जमावट भी ज्यादा रहती है।
आरंभिक संकेत तो अच्छे हैं
'यह ‘टेंपरेरी फेज’ (अस्थायी अवस्था) है। सिर्फ 10 साल के अरसे में ग्लेशियर के एडवांसमेंट या स्लोडाउन से पड़ने वाले असर के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। क्लाइमेट चेंज तेजी से होता है। पुख्ता तौर पर कुछ कहने के लिए लगभग 30 साल का वक्त चाहिए। अलबत्ता बढ़िया बर्फ जमने और ढालों के कम होने से भविष्य के वाटर रिजर्व के तौर पर इसे अच्छा संकेत माना जा सकता है।'
- डा. डीपी डोभाल, विशेषज्ञ-सेंटर आफ ग्लेशियोलाजी, वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान