हालांकि यह कह तो दिया गया है कि पुनर्वास के लिए गांवों को जरूरत पड़ने पर जंगल की जमीन दी जाएगी पर व्यवहारिक स्तर पर मामला इतना आसान भी नही है।
पुराना ट्रे रिकार्ड देखा जाए तो बात आसानी से स्पष्ट हो भी जाती है। पहला पेच पुनर्वास वाले गांवों को लेकर ही है। गांवों का पुनर्वास करने से पहले गांव का भूगर्भीय सर्वे जरूरी है। पिछले पांच सालों में केवल 88 गांवों का सर्वे ही हो पाया है। सरकारी आंकड़ों में ही पुनर्वास की जरूरत वाले 280 गांव हैं।
बाकी गांवों का सर्वे कब तक होगा यह साफ नही है। यह स्थिति तब है जबकि हर साल इन अति संवेदनशील गांवों की संख्या बढ़ रही है। सर्वे के बिना यह तय करना मुश्किल है कि गांवों को कितनी जमीन की जरूरत होगी और क्या पूरा गांव ही विस्थापित होगा।
कौन करेगा सर्वे
दूसरा पेच यह है कि इन गांवों को नई जगह पर बसाने के लिए भी सर्वे की जरूरत होगी। अभी यह साफ नही है कि इस नई जमीन का सर्वे कौन करेगा और यह कब तक पूरा होगा। तीसरी सबसे बड़ी परेशानी सरकारी सिस्टम की सुस्त चाल की है।
वन अधिनियम के कारण रुकी पड़ी सड़कों की समीक्षा मे भी यह बात सामने आई थी। करीब दो माह पहले हुई इस समीक्षा में यह पाया गया था कि सड़के वन अधिनियम के कारण कम और सही समय पर सही तरीके का प्रस्ताव न बनाने के कारण ही अधिकतर सड़कें रुकी पड़ी हैं।
संवेदनशील नेतृत्व की जरूरत
चौथी एक समस्या गांवों की सामाजिक और आर्थिक संरचना को लेकर होगी जिसे सुलझाने के लिए संवेदनशील नेतृत्व की जरूरत होगी। चमोली मे लक्ष्मण गंगा के कारण इस बार विस्थापन की कगार पर आए भ्यूंदार गांव के मामले से इस पहेली को समझा जा सकता है।
भ्यूंदार के 99 परिवार इस समय जोशीमठ में एक यूथ हास्टल में शरणार्थी बने हुए हैं। इस गांव के करीब 15 परिवार ऐसे भी हैं जो जोसीमठ को अपना अस्थाई आवास आपदा से पहले ही बना चुके हैं।
जोशीमठ के पास मांग रहे जमीन
ये परिवार जोशीमठ के पास ही जमीन देने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर भ्यूंदार के अन्य परिवार पूरी तरह से तबाह हो चुके भ्यूंदार के पास ही जमीन की मांग कर रहे हैं। जाहिर है कि गांव के पुनर्वास से पहले इस पहेली को भी हल करना होगा।