उत्तराखंड के सियासी गलियारों में इस बार होली का रंग नहीं चढ़ पाएगा। सत्ता परिवर्तन के लिए शुरू हुई नूरा कुश्ती अगले कुछ दिनों में और गुल खिलाने वाली है।
इन हालातों में अधिकांश विधायकों को होली के दिन परिवार के साथ अपने क्षेत्र से भी महरूम रहना पड़ सकता है। अपने किले में सेंधमारी से बचाने के लिए कांग्रेस और भाजपा विधायकों को नजरबंद करने में कोई कसर छोड़ने वाली नहीं हैं। एक दूसरे की कमजोर नब्ज दबाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का हथकंडा अपनाने में कोई गुरेज नहीं करेगा।
उत्तराखंड की सियासत में आए भूचाल ने होली के रंगों को बदरंग कर दिया है। वैसे तो रंगों का यह त्योहार कटुता को भुलाकर आपसी सद्भाव बढ़ाने का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार होली से ठीक पहले राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर सत्ता और विपक्ष में तलवारें खिंच गई हैं। ऐसे में राजनीतिज्ञों में होली का खुमार और उल्लास नजर नहीं आएगा।
पहले दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नेता एक दूसरे से मिलकर खुशियां बांटते रहे। विधानसभा में भाजपा की गोद में बैठकर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत की अगुवाई में कांग्रेस के नौ विधायकों के बगावत से रावत सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इन बागियों और अपनी पार्टी के विधायकों को लेकर भाजपा जेट विमान से रात में ही दिल्ली ले गई।
वहीं, शनिवार को राज्यपाल की ओर से सीएम हरीश रावत को सदन में बहुमत साबित करने के लिए 28 मार्च तक का समय देने के बाद माना जा रहा है कि दिल्ली गए विधायक अब सीधे सदन में नजर आएंगे। जाहिर है कि ऐसे में उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र की होली से भी वंचित रहना पड़ेगा।
यह भी तय हो चुका है कि शक्तिमान घोड़े की टांग तोड़ने के मामले में फंसे भाजपा विधायक गणेश जोशी की होली भी जेल की चारदीवारी के भीतर ही मनेगी।
जाहिर है कि कांग्रेस भी अपने पाले के विधायकों की गोलबंदी में किसी तरह की कमी नहीं छोड़ेगी। इन हालातों में सियासी गलियारों में होली के रंग बिखरने की उम्मीद ना के बराबर ही है। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि सत्ता बदलाव की जंग में बिन होली रंगों की होली खेलने का मौका किसके हाथ लगेगा।