खेती को घाटे का सौदा बताते हुए इसे छोड़ने और युवाओं के नौकरी की तलाश में पलायन कर जाने से पहाड़ के आबाद गांव जहां खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। वहीं 12 साल आईटी कंपनी संभालने के बाद देहरादून की हिरेशा वर्मा प्रदेश के दूरदराज के गांवों में जाकर महिलाओं को मशरूम उत्पादन के प्रति प्रोत्साहित कर रही हैं।
पिछले तीन साल में एक हजार से अधिक महिलाओं को वह मशरूम उत्पादन के गुर सिखाकर उन्हें इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। वह कहती हैं कि खाली हो चुके घरों में मशरूम का उत्पादन कर गांवों को फिर से आबाद किया जा सकता है।
नौकरी के लिए पलायन कर चुके युवाओं के लिए हिरेशा मिसाल हैं।
12 साल तक आईटी कंपनी चलाने वाली शिमला बाईपास रोड निवासी हिरेशा ने वर्ष 2010 में शौकिया तौर पर 25 बैग कंपोस्ट से मशरूम उत्पादन शुरू किया। आज उनका अपर छरबा देहरादून में एक करोड़ रुपये का प्लांट हैं।
दो हजार से अधिक लोगों को सिखा चुकी हैं खेती
मशरूम
- फोटो : Demo Pic.
हिरेशा दूरदराज से प्लांट में आने वाले ग्रामीणों को इसके उत्पादन की जानकारी के साथ ही चमोली, गोपेश्वर, टिहरी, हल्द्वानी में 1200 महिलाओं सहित दो हजार से अधिक लोगों को इसके गुर सिखा चुकी हैं। हिरेशा बताती हैं कि निशुल्क रूप से महिलाओं को इसका प्रशिक्षण दे रही हैं ताकि पहाड़ की महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें।
वे कहती हैं कि छोटे स्तर पर यदि किसी को मशरूम का उत्पादन करता है तो एक कमरे के भवन से भी इसकी शुरूआत की जा सकती है।
यहां है मशरूम की बड़ी मांग
होटल, ढाबों, हॉस्टलों में मशरूम की बड़ी मांग हैं। कुछ कंपनियां तो विदेशों में इसे निर्यात कर रही हैं। इसमें सूखी मशरूम की कीमत एक हजार रुपये किलोग्राम तक है।
खंडहर हो चुके गांवों में ग्रामीण फिर से लौटें और मशरूम उत्पादन करें इसके लिए सरकार की ओर से विशेष योजना चलाई गई है। विभाग पहले से छोटी यूनिटों के लिए 50 क्विंटल कंपोस्ट और स्पोन में 50 फीसदी तक की सब्सिडी दे रहा है। यमुना घाटी नौगांव में कई लोग इसके लिए आगे आए हैं।
- बीएस नेगी, निदेश उद्यान