पंचपुरी में अब रणनीति बनाकर चुनाव लड़ाने वालों की कमी हो गई है। यह काम खुद प्रत्याशियों को करना पड़ रहा है। मतदाता सूची से लेकर पर्ची तक बांटने के काम में प्रत्याशी को जूझना पड़ता है। सहयोगी नेता या तो पद चाहते है या फिर कहीं न कहीं का टिकट। रणनीतिकारों की कमी पूरा करने का कोई यत्न कई दशकों से नहीं किया गया।
बहुत पुरानी बात नहीं जब सारा चुनाव रणनीतिकारों के भरोसे ही चला करता था। तीनों बस्तियों में ऐसे अनेक चुनाव लड़ाने वाले थे, जो न तो कभी खुद चुनाव लड़े और न ही अपने भाई भतीजे के लिए कोई पद मांगा। इन नेताओं की एक पूरी विरासत पंचपुरी में लंबे अर्से तक चलती रही। देश के पहले चुनाव से ही उन्होंने जिंदगी अपने दलों के प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने में खपा दी। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि उनका दल किसे प्रत्याशी बनाता है। वे तो चुनाव जीत जाने के बाद भी भविष्य की रणनीति बनाने में जुटे रहते थे। ज्वालापुर में पंडित वासुदेव ठेकेदार, रामकिशन मेहता, राव इकबाल, शिवकुमार भक्त, बशेसर दत्त मिश्रा, वैद्य पदम चंद गुप्ता, वैद्य सोमदत्त शर्मा, पंडित शिवकुमार सिखौला, नरेंद्र त्यागी, राव चांद खा, रामकुमार लच्छीराम, राव जर्रार आदि ऐसे नेता थे, जिन्होंने जीवन भर चुनाव ही लड़ाए। अब वह चुनाव चाहे विधानसभा के हों, लोकसभा के या स्थानीय निकायों के चुनाव रहे हो। कनखल में बाबू माई दयाल, लाल मोहनलाल, सुधीर शर्मा, पंडित चिरंजी लाल और सुधीर शर्मा के नाम भुलाए नहीं भूलते। ये नेता चुनाव हो जाने के बाद से ही अगले चुनाव की तैयारियों में जुट जाते थे। ज्वालापुर और कनखल के चुनावी रणनीतिकार आपस में भी एक दूसरे के पास जाकर नीतियों के गुर सीखते थे। उनका काम केवल यह देखना था कि पर्ची बट जाएं, चुनावी धन आ जाए और मतदान केंद्रों के बाहर बस्ते बिछ जाए। बस्ते पर बैठने वालों के लिए दाल रोटी का प्रबंध उन्हीं के जिम्मे था।
हरिद्वार में ऐसे नेताओं की लंबी कतार रही है। ठाकुर किशोर सिंह, गुरू प्रसाद सक्सेना, शंभूनाथ कंबल वाले, डीएन सान्याल, एमपी सिंह, महिनारायण झा, चंद्रमणी, मास्टर करतार सिंह, रघुवीर बेदी, राजकुमार चड्ढा, काका छोले वाले, ईश्वरी देवी आदि ऐसे अनेक नेता रहे हैं, जिन्होंने पूरा जीवन दूसरों को लड़ाने और नगर हित की योजना बनाने में लगा दिया। ये नेता पर्दे के पीछे रहकर चुने गए प्रतिनिधियों से गली मोहल्ले के काम खुद कराया करते थे। तब वाहनों और टेलीफोन का जमाना नहीं था। ये नेता साइकिलों पर जाकर गली मोहल्लों में वोट खरे करने का काम किया करते थे। आज की राजनीति में किसी भी दल के पास ऐसा एक भी नेता दिखाई नहीं देता। चुनावी अभियान में नेताओं की बाढ़ है, पर जिताऊ रणनीतिकार एक भी नहीं। प्रत्याशी खुद ही अपनी लड़ाई धन के बलबूते पर लड़ने को मजबूर हैं।