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भारतीय संस्कृति में है पशु-पक्षियों का बड़ा सम्मान

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धर्म शास्त्रों में वसुधा के सभी जीवों के जीवन की कामना की गई है। जलचर हों, भूमिचर या नभचर, सभी को साथ लेकर चलने का विधान है। अध्यात्म कहता है कि जगत पर अकेले मनुष्य का नहीं बल्कि लाखों अन्य जीव जंतुओं और पशु पक्षियों का भी पूरा हिस्सा है। यही कारण है कि धार्मिक प्रबंधों में पक्षियों को भी शामिल किया गया है। कुछ कुप्रथाओं एवं तांत्रिक गतिविधियों के चलते उल्लू जैसे पक्षियों के लुप्त होने की बात भी सामने आती रही है।
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श्राद्ध पक्ष में पितरों के साथ कव्य और हव्य भी निकाले जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार ब्राह्मण को श्राद्ध का भोजन कराने से पूर्व काग और श्वान को भोजन दिया जाता है। यद्यपि कुछ अन्य कारणों से कौवों की संख्या में कमी आई है, लेकिन आश्चर्य का विषय है कि भादों के श्राद्ध पक्ष में कौवे दिखाई देने लगते हैं। श्राद्ध पक्ष में गाय को नियमित रूप से रोटी दी जाती है। पंडित हरिओम जयवाल शास्त्री बताते हैं कि पक्षियों को दाना डालने से अनेक प्रकार के संकट टल जाते हैं। प्राचीन काल से देशवासी कीट पतंगों और चीटियों को आटा डालते आए हैं। कबूतरों को दाना डालने की पुरानी परंपरा है। राजस्थान और गुजरात के सैकड़ों शहरों में कबूतरों के चौक मौजूद हैं। अनेक मोहल्लों के नाम ही कबूतरों का चौक मोहल्ला पड़ गया है।
धर्मशास्त्रों में चिड़ियों और पक्षियों के लिए हजारों लोग छतों पर पानी भरकर रखते हैं। छतों पर सतनजा के नाम से सात प्रकार के अनाज उड़ने वाले पक्षियों के लिए डाले जाते हैं। सतनजा के बारे में कहा गया है कि पक्षियों को सतनजा खिलाने के लिए सवेरे के समय नदियों के किनारे जाना चाहिए। पंडित शिव कुमार शास्त्री के अनुसार चिड़ियों कबूतरों को सतनजा खिलाने से पितृ दोषों का निवारण हो जाता है। दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी के साथ उल्लू की भी पूजा प्रतीकात्मक रूप से की जाती है। गरुड़ पक्षी की पूजा भगवान विष्णु के साथ होती है। संवाद
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तंत्र जगत ने पक्षियों को पहुंचाई क्षति
पक्षीविद पूरण चंद शर्मा कहा करते थे कि अब तो बलि प्रथा बन्द होती जा रही है, लेकिन पहले तांत्रिकों ने उल्लू, कबूतर, कोयल और चमगादड़ों पर काफी कहर बरपाया है। जंगलों में अघोर साधना करने वाले उल्लू पकड़कर श्मशान के शवों के साथ उनके वीभत्स प्रयोग कर पक्षियों को समाप्त करने में योगदान करते थे। अलबत्ता अब तांत्रिकों, मांत्रिकों और अघोरियों की संख्या घटने से इस कुप्रथा में कमी आई है।
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