फागुन का फगुनाता मौसम हो और सामने हों पंचपुरी की चटोरी गलियां। तो फिर जायकों का रस घुल ही जाता है। वसंत ऋतु में हरिद्वार के चटकारों का क्या कहना। होली आई तो फिर क्या बाजार और क्या घरों की रसोई। यहां के स्वाद भी लाजवाब और जायके भी बेहिसाब। चाट गली में चार पीढ़ियों से चल रही जैन की चाट दुकान हो या फिर ज्वालापुर में हुकम की चाट, तृप्त न कर दे तो फिर क्या बात। कुमार के समोसे और गोयल के पनीर वाले पकौड़े या फिर रघुवीर के दाल बड़े। स्वाद भी अनोखे और इमली की चटनी भी निराली।
कनखल में मंगल और बिसने की चाट को भला कौन भुला सकता है। याद करें तो गरम जी भी याद आते हैं। गरम जी गरम जी की कड़क आवाज लगाकर वे बेमिसाल छोले बेचते थे। कनखल के सती घाट पर फलों की चाट बनाने वाले जगदीश की चाट न सिर्फ कनखल वालों ने खाई, बल्कि अस्थि प्रवाह के लिए देशभर से आने वाले यात्रियों में ने भी कम नहीं खाई। कनखल चौक पर बाबू के दाल छोले न जाने पंचपुरी के कितने घरों में खाए गए होंगे।
हरिद्वार में जैन की चाट तो खैर इश्कलाल के बाद इतनी मशहूर हुई कि लंदन में बसे भारतीय भी उनके बेटे को लंदन ले गए। वहां सालभर तक चाट की दुकान खोली और खूब काम चला। लेकिन जैन बाबू की रूह गंगा जी में बसती थी और वे लौट आए। सोशल मीडिया से वे इतने लोकप्रिय हुए कि अब बाहर से आने वाले यात्रियों का एक मकसद जैन की चाट खाना भी है। इसी तरह हरकी पैड़ी से सटे सुभाष घाट प्लेटफार्म का चाट बाजार दूर दूर तक मशहूर था। यात्रियों का एक आकर्षण सुभाष घाट की चाट खाना जरूर रहता था। चित्रा टाकीज के बाहर महेश की मटर पनीर वाली टिक्की भी बड़ी मशहूर है। भगवती छोले वाले को कौन नहीं जानता। नए हरिद्वार में बीकानेर वाला, मोहन पूरी वाले और तहसील के बाहर मथुरा वाले की चाट टिक्की और गोलगप्पे बेमिसाल हैं।
बात चाट की हो और चर्चा व्यवसायिक उपनगरी ज्वालापुर की न हो संभव नहीं। ज्वालापुर तो हलवाइयों की मशहूर बस्ती रही है। पंचपुरी में सबसे मशहूर नाम इश्कलाल का रहा जिनकी चाट नेहरू जी ने भी खाई और डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी। उन्हीं के बराबर कटहरा बाजार के राधेश्याम की चाट थी। घास मंडी में टीटी की चाट सांगरी लाजवाब थी। आज उसी के पास रमेश सैनी की चाट टिक्की खाने वालों का तांता लगा रहता है। रेलवे फाटक पर अमित चाट और प्रकाश चाट के भी बड़े जलवे हैं। रामलीला मैदान में हुकम, गुरुद्वारा रोड पर प्रजापति और सर्राफा बाजार में रमेश की चाट ज्वालापुर का आकर्षण बनी हुई है। तो फागुन का मदमाता मौसम आ गया है। आइये, चाट खाइए।