गंगा दशहरे के दिन भगवती गंगा शिव की जटाओं से निकलकर धरती पर आईं थीं। गंगा के आने का प्रयोजन केवल 60 हजार सगर पुत्रों की राख बहाना नहीं था। वास्तव में गंगा को उन सप्त सिंधुओं को भी भरना था, जिन्हें सूर्य के आदेश पर अगस्त्य मुनि ने पी लिया था।
गंगा का जन्म ब्रह्मा के दरबार में राधा-कृष्ण के महारास से हुआ था। भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा वैशाखा शुक्ल सप्तमी के दिन शिव की जटाओं में आईं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा का आगमन शिव के जटाजूटों से धरा धाम पर हुआ। वास्तव में कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए इक्षवाकु वंशज सगर के 60 हजार पुत्र जलकर भस्म हो गए थे।
चूंकि सूर्य की कृपा से अगस्त्य मुनि ने तीन आचमन में सप्त सिंधुओं का समूचा जल पी लिया था, अत: सारे समुद्र खाली पड़े थे। भगीरथ को राख बहाने के साथ-साथ समुद्रों को भी जल से पुन: भरना था। जल की कमी के चलते धरा पर त्राहि-त्राहि मची हुई थी।
शिव की अनेक जटाओं से गंगा अनेक धाराओं में बंटकर गंगा दशहरे के दिन जमीन पर आईं। बहता हुआ सभी धाराओं का जल समुद्रों में मिला और समुद्र एक बार फिर से भर गए। महाभारत के वन पर्व में इस पूरी कथा का उल्लेख है। गंगा के सागर तट पर पहुंचते ही सगर पुत्रों की राख भी बह गई और धीरे-धीरे मुनि के पान से सूखे समुद्रों को भी जल मिल गया। धरती पर बिगड़ा वर्षा चक्र पुन: प्रारंभ हो गया। गंगा दशहरा धरती की हरियाली का भी प्रतीक है।
गंगा लाने को चार पीढिय़ों ने किया तप
गंगा अकेले भगीरथ ही नहीं लाए। श्रीराम के पुरखे सगर ने अपने 60 हजार पुत्र भस्म हो जाने पर गंगा को लाने के लिए शेष बचे पुत्र असमंजस को गंगा लाने का दायित्व सौंपा। असमंजस का जीवन बीत गया, गंगा नहीं आई। उनके पुत्र अंशुमान जीवन भर गंगा के लिए मार्ग बनाते रहे। गंगा फिर भी न आई।
अंशुमान के पुत्र राजा दिलीप का भी पूरा जीवन गंगा लाने में खप गया। अंतत: महा तपस्वी दिलीप के पुत्र भगीरथ शंखनाद करते हुए गंगा को दशहरे के दिन धरती पर ले आए।