खानपुर क्षेत्र के ग्राम प्रहलादपुर निवासी बुजुर्ग सुखबीर सिंह के लिए गौरैया की सेवा ही अब बची खुची जिंदगी का मकसद बन गई है। जीवन के 75 बसंत देख चुके सुखबीर सिंह के गौरैया की सेवा में सुबह और शाम कई घंटे बीताते हैं। उनके लिए कभी रोटी कभी बाजरा तो कभी पानी का इंतजाम करना उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा है।
सेवाभाव का प्रतिफल यह है कि पिछले कई सालों से उनके यहां गौरैया का परिवार लगातार बढ़ता जा रहा है और उनके यहां करीब 22 गौरैया हैं। जिले के अति पिछड़े गांव प्रहलादपुर में रहने वाले सुखबीर सिंह ने शादी नहीं की। वह अपने छोटे भाई के परिवार के साथ ही रहते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों के साथ खेती में हाथ बंटाना और बच्चों से लाड़-प्यार में ही उनका जीवन बीत रहा है।
इससे अलग जो समय बचता है उसे वह गौरैया की सेवा में बिताते हैं। आसपास के बच्चे उन्हें चिड़िया वाले बाबा के नाम से भी पुकारते हैं। उनकी बैठक में गौरैया ने कई घोंसले बनाए हुए हैं। उनकी देखरेख करना और गौरैया के लिए भोजन-पानी का इंतजाम करना सुखवीर सिंह की दिनचर्या में शामिल है।
मां से मिली प्रेरणा
सुखवीर सिंह ने बताया कि उन्हें गौरैया से प्रेम की प्रेरणा से अपनी मां से मिली। मां जब भी खाना बनाती थी तो उसमें से चिड़ियों के लिए अलग से हिस्सा जरूर निकालती थी।
धीरे-धीरे वह भी ऐसा ही करने लगे। उनके आंगन में बचपन से ही चिड़िया की चहचहाहट छाई रहती है। अब तो आसपास के बच्चे और उनके बुजुर्ग साथी भी उनके साथ गौरैया की सेवा में जुटे रहते हैं।
कंक्रीट के जंगल से नुकसान
सुखबीर सिंह बताते हैं कि लगातार बढ़ रहे कंक्रीट के जंगल से गौरैया को भारी नुकसान हुआ है। अब घोंसले के लिए सबसे मुफीद समझी जाने वाली कांस की घास दूर-दूर तक नहीं दिखती। गौरैया सबसे ज्यादा उसी घास का घोंसला बनाती थी।
अब यह घास नहीं बनने की स्थिति में कभी दूब तो कभी हल्की लकड़ी से घोंसला बनाती है, जिसका प्रभाव गौरैया की सेहत पर पड़ रहा है। इन दिनों होने वाली गौरैया अब सेहत में कमजोर दिख रही है।