एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की ओर से गठित जांच टीम ने हरिद्वार में गंगा के आसपास चल रहे सभी स्टोन क्रशरों को बंद करने की संस्तुति की है। टीम ने अपनी रिपोर्ट में गंगा में मशीनों से खनन और क्रशिंग की विभीषिका भी उजागर की है। वहीं मातृसदन ने इस रिपोर्ट को वास्तविकता का महज 10 प्रतिशत बताया है। साथ ही आरोप लगाया कि इस विभीषिका के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और अन्य लोगों के नामों का खुलासा नहीं किया गया है। शिकायतकर्ता होने के नाते उनका पक्ष न जानने पर भी मातृसदन ने कड़ी नाराजगी जताई।
मातृसदन में पत्रकारों से वार्ता करते हुए परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद महाराज ने बताया कि ब्रह्मचारी दयानंद की शिकायत पर एनजीटी ने 18 फरवरी 2016 को एक जांच टीम का गठन किया था। गंगा में खनन की विभीषिका और इसके कारणों के अलावा गंगा की दुर्दशा के लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं, इन सभी तथ्यों की जांच पड़ताल इस कमेटी को करनी थी। कमेटी में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय वन्य जीव संस्थान, भूतत्व एवं जल संरक्षण आदि संस्थानों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। बताया कि जांच टीम बीते तीन फरवरी और 28 फरवरी को हरिद्वार पहुंची और श्यामपुर, पथरी, बिशनपुर, भोगपुर आदि खनन प्रभावित जगहों का जायजा लिया। टीम ने श्यामपुर के दो क्रशर एपी एसोसिएट और इंडीवर क्रशर का निरीक्षण भी किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों ही क्रशरों पर क्रशिंग और भंडारण का लाइसेंस नहीं पाया गया। क्रशर के आसपास बड़े पैमाने पर बड़ी-बड़ी मशीनों से पत्थर की खुदाई कर खनन भी पाया गया। लिहाजा टीम ने प्रदेश सरकार से गंगा के आसपास चलने वाले सभी क्रशरों को बंद करने की संस्तुति की। वहीं स्वामी शिवानंद महाराज का कहना है कि शिकायतकर्ता होने के नाते टीम को मातृसदन का पक्ष भी जाना चाहिए था।
रिपोर्ट में खनन व क्रशिंग की जो विभीषिका बयान की गई है, वह वास्तविकता का महज 10 प्रतिशत है। स्वामी शिवानंद ने कहा कि धरातल पर स्थिति इससे कहीं ज्यादा बदतर है। वहीं गंगा की इस हालत के लिए कौन कौन जिम्मेदार है, जांच टीम ने इसका उल्लेख नहीं किया। अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाते हुए स्वामी शिवानंद ने कहा कि रिपोर्ट की त्रुटियां गिनाते हुए एनजीटी को पत्र लिखा जा रहा है। स्वामी शिवानंद ने प्रदेश सरकार के खनन की पैरवी पर भी सवाल उठाए और कहा कि इस रिपोर्ट को दबाकर सरकार खनन खुलवाने के सुप्रीम कोर्ट चली गई। फिर कैसे सरकार के मुखिया को ईमानदार कहा जा सकता है।
रिपोर्ट में बड़े-बड़े गड्ढों का जिक्र
जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में स्थलीय निरीक्षण का आंखों देखा हाल बयान करते हुए बताया है कि गंगा में 30 से 100 मीटर तक लंबे और पांच से 10 मीटर तक चौड़े व तीन से चार मीटर तक गहरे गड्ढे पाए गए हैं। साथ ही एपी एसोसिएट क्रशर से पांच जेसीबी, आठ डंपर और 15 ट्रैक्टर ट्राली व इंडीवर क्रशर से तीन जेसीबी, तीन ट्रक भी खड़े पाए गए।
मानव और वन्य जीवों में बढ़ सकता है संघर्ष
टीम ने गंगा के दाएं और बाएं दोनों किनारों का हाल जाना है। आसपास वन क्षेत्र का हवाला देते हुए हाथी कॉरिडोर का जिक्र भी किया गया है। साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि गंगा में खनन व क्रशिंग गतिविधियों से वन्य जीव और मानव संघर्ष भविष्य में और बढ़ सकता है। वहीं स्वामी शिवानंद ने कहा कि टीम ने केवल तकनीकी जांच की है। जबकि वैज्ञानिक तरीके से जांच करने पर पता चलता है कि खनन से जैव विविधता को किस कदर नुकसान पहुंचा है। कछुआ और मछली की विभिन्न प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।
मातृसदन ने पूछा, डीएम और सीएम की कुर्सी कितने की
हरिद्वार। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पीयूषकांत दीक्षित के कुर्सी प्रकरण को उछाले जाने पर मातृसदन ने विद्वान का अपमान बताया है। स्वामी शिवानंद ने कहा कि कुलपति को उनकी इच्छानुसार कुर्सी मिलनी ही चाहिए। आरोप लगाया कि स्वार्थों की पूर्ति न होने पर कुछ अधिकारियों ने ही प्रकरण का इतना तूल दिया है। अब उन्होंने आरटीआई में जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की कुर्सियों की कीमत पूछी है।