जयराम पीठाधीश्वर ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि संस्कृत वास्तव में भारतीय भाषाओं का तिलक है। संस्कृत न रहेगी तो न तीर्थ बचेंगे, न ब्राह्मण और न संस्कृति। मठ मंदिर तीर्थों की बपौती हैं। इन पर किसी को भी राजनीति करने का अधिकार नहीं है।
ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी शनिवार की शाम गंगा स्वरूप आश्रम में अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के अधिवेशन के उद्घाटन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कर्मकांड के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है। शास्त्र तो ब्राह्मणों की शक्ति है और इनका अध्ययन संस्कृत के बगैर असंभव है। हमारा देश अध्यात्म के सहारे आगे बढ़ा है। देश की पवित्र नदियों में तीर्थों को सम्मान दिलाया है। तीर्थत्व की रक्षा के लिए तीर्थ पुरोहित एवं संस्कृत का जीवित रहना जरूरी है। संस्कृत के बगैर पुरोहित समाज अपनी पहचान खो देगा। उन्होंने कहा कि पुरोहित समाज को किसी का भी वोट बैंक नहीं बनना चाहिए। संस्कृत के महत्व को जानकर ही उन्होंने हरिद्वार में संस्कृत विश्वविद्यालय और संस्कृत अकादमी की स्थापना कराई थी।
महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित महेश पाठक ने कहा कि पूर्वजों की परंपरा को तीर्थों पर सींचा गया है। पुरोहित समाज अब किसी मठ मंदिर का अधिग्रहण करने का अधिकार सरकारों को नहीं देगा। सरकारों का दायित्व है कि पर्यटन के समानांतर तीर्थाटन का विकास किया जाए। प्राय: देखने में आया है कि तीर्थों पर मठ, मंदिरों को लेकर कई राजनीतिक दल राजनीति करते आए हैं। इसका अधिकार किसी को नहीं। ये राजनीतिक दल केवल अपनी राजनीति चमकाते हैं और तीर्थों के विकास से उनका कोई लेनादेना नहीं है। तीर्थों का विकास युगों से परंपरागत तीर्थ पुरोहित करते आ रहे हैं।
महासभा ने 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के हिंदुओं को तीर्थाटन के लिए सरकारी सहायता देने की मांग की है। महासभा को गंगा सभा अध्यक्ष गांधीवादी पुरुषोत्तम शर्मा, कृष्ण कुमार शर्मा, राम कुमार मिश्रा, राष्ट्रीय महामंत्री श्रीकांत वशिष्ठ, उज्जैन के राजेश मिश्र, बैजनाथ धाम के दुर्लभ मिश्र, कुरुक्षेत्र के श्रीप्रकाश मिश्र, मथुरा के दिनेश पाठक, प्रयाग के राम रतन तिवारी, जय नारायण शर्मा, ओमप्रकाश शर्मा आदि ने भी संबोधित किया।
वैदिक ऋचाओं से एकलव्य ने मन मोह लिया
मात्र 10 वर्ष की आयु में अनेक ग्रंथों को कंठस्थ कर चुके तीर्थ पुरोहित परिवार के एकलव्य हरितोष ने सबका मन मोह लिया। इस बालक ने श्रीमद्भागवत, भगवत गीता, राम चरित मानस, न्याय तर्क शास्त्र आदि अनेक ग्रंथों को कंठस्थ कर रखा है। एकलव्य ने जब मंच से वैदिक ऋचाएं उच्चारित की तब देश के 80 तीर्थों से आए सैकड़ों पुरोहितों ने खड़े होकर करतल ध्वनि की।