हरिद्वार। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर शब्दों का नहीं, विचारों का महत्व है। प्रणव ध्वनि ओंकार का उच्चारण करने में कोई बुराई नहीं है। यह व्यायाम का अंग है। योग करते हुए जो ओम का उच्चारण न करना चाहे, वे अल्लाह या वाहे गुरु का उच्चारण कर सकते हैं। व्यायाम से दूर भागने का कोई बहाना नहीं होना चाहिए।
योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि पिछले वर्ष अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भी यह सवाल इसी तरह उठाया गया था। योग का अर्थ सबको जोड़ना है। योग और प्राणायाम करने में शरीर और प्राणों का महत्व है। योग आरंभ करते हुए प्रणव ध्वनि ओंकार से शुुरुआत होती है। जो लोग ओंकार की ध्वनि न करना चाहें वे अपने धर्मों के अनुसार कोई ध्वनि कर सकते हैं। कई शिविरों में पहले भी ओम के स्थान पर अल्लाह का उद्घोष किया गया है। योग गुरुओं को इसमें कभी कोई आपत्ति नहीं रही। स्वामी रामदेव ने कहा कि योग के शिविरों में लाखों की संख्या में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आते रहे हैं। कभी कोई परेशानी ओम ध्वनि को लेकर पैदा नहीं हुई। जो लोग ओम न कहना चाहें वे उस समय चुप भी रह सकते हैं। शेष आसन और प्राणायाम करने में किसी शब्द का प्रयोग नहीं करना पड़ता।
स्वामी रामदेव ने कहा कि योग के माध्यम से भारत वर्ष ही नहीं, विश्व के 140 देशों में क्रांति हुई है। अनेक मुस्लिम देशों लाखों लोग घरों और पार्कों में जाकर योग करते हैं। समूूचा यूरोप ईसाई होते हुए भी योग को दशकों पहले अपना चुका है। असाध्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए मानव मात्र को योग अपनाना चाहिए। योग करने में मजहब की कोई बाधा नहीं है। रामदेव ने कहा कि पतंजलि और भारत स्वाभिमान आंदोलन से हजारों की संख्या में मुस्लिम जुड़े हुए हैं। वे स्वयं भी प्रतिदिन योग करते हैं और शिविरों में दूसरों को भी कराते हैं। योग का धर्म से कोई बैर नहीं है।