16 दिनों का पितृ तर्पण पूर्णिमा से प्रारंभ हो गया है। हजारों श्रद्धालुओं ने नारायणी शिला और कुशावर्त जाकर पितृ कर्म संपन्न कराया। सूर्यनारायण के कन्या राशि में प्रवेश करते ही शीत ऋतु की भी शुरुआत हो गई।
16 दिनों का श्राद्ध पक्ष दो तिथियों के एक ही दिन पड़ने से इस बार 15 दिनों का होगा। तृतीया और चतुर्थी का श्राद्ध एक ही दिन 19 सितंबर को होगा। इस दिन दोनों तिथियां मौजूद रहेंगी। दोनों तिथियों के पितृ अपने वंशजों के घरों में भोजन करेंगे। मान्यता है कि पूर्णिमा के सवेरे सूर्योदय के साथ दक्षिण में कहीं बसे पितृ लोक से पितरों का आगमन धरती पर होता है। अमावस्या के दिन ये पितृ वापस लौट जाएंगे। अब प्रतिदिन नियत तिथि के अनुसार घरों में पितरों का श्राद्ध तर्पण किया जाएगा। धारणा है कि जिस तिथि को मृत्यु होती है, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में उसी तिथि को अमुक पितृ को घरों में भोजन और तर्पण का जल दिया जाता है। जिन पितरों की तिथि का ज्ञान न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करने की परंपरा है। मातृपक्ष की तिथि ज्ञात न हो तो इस पक्ष के सभी श्राद्ध नवमी तिथि को करते हैं।
राजस्थान से आए सर्वाधिक श्रद्धालु
शुक्रवार को महालय श्राद्ध करने के लिए राजस्थान से सर्वाधिक श्रद्धालु पहुंचे। इसके बाद आने वालों में पंजाब के यात्रियों की संख्या थी। अब प्रतिदिन तिथि के अनुसार श्रद्धालुओं का आगमन चलता रहेगा। यूं तो यह श्राद्ध घर में किया जाता है, लेकिन बहुत से लोग गंगा तट पर आकर श्राद्ध तर्पण करते हैं।
तीन प्रकार से होता है श्राद्ध
श्राद्ध तीन प्रकार से किया जाता है। पितृ निमित्त पिंड और तर्पण से श्राद्ध हो जाता है। दूसरा श्राद्ध ब्राह्मण भोजन कराकर होता है। तीसरा श्राद्ध बिन पके अन्न के दान से भी किया जा सकता है।