जगह-जगह गहरे गड्ढे। हिचकोले खाते वाहनों के कारण यात्रियों के सिर अक्सर एक-उूसरे से टकराते है। वे गुस्से भरी निगाह से बगल वाले को देखते हैं और फिर खामोशी ओढ़ लेते हैं। यह कोई लिंक मार्ग की तस्वीर नहीं है, बल्कि हरिद्वार-दिल्ली हाईवे की है। हरिद्वार से रुड़की तक स्थिति ज्यादा ही खराब है।
फोरलेन निर्माण में जुटी एरा कंपनी भी हाईवे के रखरखाव से मुंह मोड़े हुए है। हाईवे का काम जगह- जगह आधा-अधूरा होने से भी दिक्कतें आ रही हैं। सप्तऋषि से लेकर चंडीघाट तक कई स्थान तो हादसे का सबब बने हैं। बावजूद इसके सिस्टम इस दिशा से आंखें फेरे हुए हैं। शंकराचार्य चौक से सिंहद्वार तक तो यह ही पता नहीं चलता है कि हाईवे कहां है। ऋषिकुल पुल के साथ ही सिंहद्वार के समीप स्थिति सबसे अधिक बुरी है। ज्वालापुर बाईपास एवं ज्वालापुर से लेकर रुडकी तक भी हाईवे बेहद ही खस्ताहाल है।
पब्लिक भी सुधरने को तैयार नहीं
आमजन भी यातायात नियम तोड़ने में पीछे नहीं है। कनखल से सिंहद्वार होकर शंकर आश्रम की तरफ जाने के लिए अब गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के गेट के सामने अंडर पास बना होने के बावजूद दोपहिया वाहन चालक सिंहद्वार से दाहिनी तरफ से होकर ही गुजर रहे हैं।
डायवर्जन का भी पता नहीं
फोरलेन सड़क पर डायवर्जन नहीं होने से सब अपने रिस्क पर ही वाहन दौड़ा रहे है। बड़ी बात ये है कि फोरलेन के आधे अधूरे निर्माण के कारण ही पुलिस कांस्टेबल अभिषेक कठैत की जान चली गई। कांस्टेबल का पूरा शरीर फ्लाईओवर के निर्माण के लिए बने पिलर के सरिये पर झूलता मिला था। सीधे- सीधे दिखाई दे रहा था कि सिपाही डायवर्जन को समझ नहीं पाने से वह नीचे गिरे।
नितिन गडकरी के दावे हुए हवा
नेता भाषण और वायदे के लिए जाने जाते है। ये बात केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पर भी सटीक बैठती है। वर्ष 2015 के दिसंबर माह में हरिद्वार आए केंद्रीय मंत्री ने दावा किया था कि वर्ष 2016 के जून माह तक फोरलेन पर वाहन सरपट दौड़ेंगे। जबकि हकीकत सबके सामने ही है। केवल लॉलीपॉप थमाना ही राजनीतिक दलों का मुख्य मकसद रह गया है।