हरिद्वार। हरकी पैड़ी से पहली कांवड़ ऋषि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम ने त्रेता युग में उठाई थी। पुरा महादेव सहित देश के अनेक शिवलिंग परशुराम ने हरकी पैड़ी से पाषाण ले जाकर स्थापित किए थे। हरकी पैड़ी को दूसरा ब्रह्मकुंड नाम परशुराम ने ही दिया था। श्रावण और फागुन के कांवड़ मेलों में प्रतिवर्ष परशुराम अदृश्य रूप से कांवड़ भरने आते हैं। उनके साथ उनके अनेक शिष्य भी कांवड़ भरते हैं।
त्रेता युग में विश्व विजय करने के बाद भगवान परशुराम ने भारत के अनेक स्थानों पर विजय यज्ञों का आयोजन किया। बागपत के समीप वर्तमान पुरा महादेव में भी यज्ञ आयोजित किया गया था। विख्यात वैदिक विद्वान पंडित विष्णु दत्त शर्मा के अनुसार यज्ञ के समय शिवलिंगों की स्थापना यज्ञ स्थलों पर की जानी थी। परशुराम ने स्वयं निर्णय लिया कि वे शिवलिंगों के लिए पाषाण लाएंगे। अपने शिष्यों के साथ परशुराम शिवलिंग लेने के लिए हरकी पैड़ी पहुंचे। जब शिष्य गंगा से पत्थर निकालने लगे तो सभी पाषाण मां गंगा से बिछुड़ने के शोक में हिलने को तैयार नहीं हुए। पत्थरों ने कहा कि वे गंगा छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। तब महर्षि परशुराम ने मां गंगा की तपस्या की। प्रसन्न होकर गंगा प्रकट हुई तथा परशुराम को वरदान दिया। गंगा के कहने पर भी जब पत्थर जाने को तैयार नहीं हुए, तब गंगा ने स्वयं उन्हें आदेश दिया। पाषाणों का गंगा प्रेम देखकर परशुराम भी रोने लगे। उन्होंने पत्थरों को वचन दिया कि वे स्वयं प्रतिवर्ष हरकी पैड़ी से जल ले जाकर वर्ष में दो बार शिवलिंगों को अभिषेक करेंगे। तब परशुराम से सावन और फागुन में कांवड़ ले जाकर जलाभिषेक करने का क्रम शुरू किया।
त्रेता युग में परशुराम ने स्वयं गंगा को महायात्रा कराई। आज भी दोनों महीनों की त्रयोदशी के दिन परशुराम अपने शिष्यों के साथ कांवड़ ले जाते हैं। परशुराम के साथ उनके भक्त और अब आम जनता कांवड़ ले जाने लगी। परशुराम ने हरकी पैड़ी के जिस स्थान से पाषाण उठाए थे, उसे उन्होंने स्वयं ब्रह्मकुंड नाम दिया।