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सबको रणनीति पर विश्वास, अब प्रतिद्वंद्वी बने खास

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मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही मतदाताओं की खामोशी ने प्रत्याशियों को अपनी रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया है। चुनावी दंगल में बड़े दलों के प्रत्याशियों का शह-मात का खेल शुरू हो गया है। निर्दलीय और छोटे दलों के प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों से गठबंधन कर अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गए हैं। कई सीटों पर चुनावी गणित बदल जाएगा। हरिद्वार ग्रामीण सीट इसका उदाहरण बन चुकी है। सपा प्रत्याशी के बसपा उम्मीदवार को समर्थन देते ही न केवल त्रिकोणीय मुकाबला हो गया बल्कि जातीय और मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
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14 फरवरी को मतदान है। मतदाताओं की खामोशी ने पार्टी के आला नेताओं और प्रत्याशियों की धड़कनें तेज कर दी हैं। सीटों का गणित और माहौल पूरी तरह साफ नहीं हो रहा है। हरिद्वार में 11 सीटों पर 110 प्रत्याशी चुनावी दंगल में हैं। भाजपा-कांग्रेस, सपा-बसपा और आप पार्टी को छोड़कर बाकी छोटे दलों और निर्दलीय हर सीट पर ताल ठोक रहे हैं। साफ तौर पर सात सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला है। वहीं देहात क्षेत्र की तीन और ग्रामीण सीट पर बसपा ने मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है। भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी अपनी जीत निश्चित करने के लिए प्रचार में पूरी ताकत झोंकने के साथ अपनी रणनीति में भी बदलाव करने लगे हैं।
निर्दलीय और छोटे दलों के वोट कटुवा प्रत्याशियों से मजबूरी का गठबंधन करने लगे हैं। इसके लिए हर तरह का हथकंडा अपनाया जा रहा है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि बड़े दलों के प्रत्याशी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए निर्दलीय व छोटे दलों के उम्मीदवारों की खरीद फरोख्त कर रहे हैं। इससे निर्दलीय एवं छोटे दलों के प्रत्याशी चुनाव मैदान में रबड़ स्टंप की तरह रहेंगे जबकि उनके समर्थक बड़े प्रत्याशी के समर्थन में मतदान करेंगे और करवाएंगे। बड़े प्रत्याशियों के इस फार्मूले से कई सीटों का गणित बदल जाएगा। मतदाताओं की खामोशी के बीच बड़े दलों के हर प्रत्याशी दूसरे प्रतिद्वंद्वी को खास बनाकर अपनी रणनीति पर विश्वास करने लगे हैं।
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