हरिद्वार। अपनी जान पर खेलकर वर्ष 2004 में छह मासूम बच्चों की जान बचाने वाली इंदिरा बस्ती (लालपुल, ज्वालापुर) निवासी बहादुर बालिका बबली तो अब सयानी हो चुकी है। चार साल पहले उसकी शादी खतौली (यूपी) में हुई और अब वह अपनी तीन बेटियों के साथ जिम्मेदारी से इनकी परवरिश कर रही है। लेकिन राष्ट्रपति पुरस्कार पाने के बाद सभी की लाडली बनी बबली के परिवार की सुध कोई नहीं ले रहा है। उसका परिवार अब तक तंगहाली में जी रहा है। सरकार और संस्थाओं की ओर से किए गए वादे-दावे सब घोषणाओं तक सिमटे हुए हैं।
इंदिरा बस्ती निवासी शादी हुसैन की नौ संतानों में से आठवें नंबर की बबली उस समय करीब 14 साल की थी। एक जून 2004 की शाम को मोहल्ले के बच्चे गंगनहर के किनारे एक रेहडे़ पर खेल रहे थे तभी अनियंत्रित होकर रेहड़ा गंगनहर में जा गिरा। पास में खड़ी बबली ने अपनी जान की परवाह किए बिना गंगनहर में छलांग लगा दी और जैसेतैसे छह मासूमों को सकुशल बाहर निकाला। बबली की बहादुरी की गूंज दिल्ली तक पहुंची। उसे राज्यपाल ने सम्मानित किया। उसके बाद कई संस्थाओं ने भी सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बबली को वीरता पुरस्कार दिया। बबली का परिवार अब भी गंगनहर के किनारे एक छोटे से मकान में रह रहा है। उसके पिता शादी हुसैन और बहन साजिदा ने बताया कि बबली की चार साल पहले खतौली में शादी हो चुकी है।
सम्मान पाने के बाद बबली को सम्मान तो खूब मिला लेकिन परिवार के हालात नहीं बदले। उसके एक भाई की कुछ समय पहले कैंसर के चलते मौत हो चुकी है। भाई के इलाज के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी ने ढाई लाख रुपये दिए थे। उसके बाद सरकार ने मदद का भरोसा दिया था लेकिन कई चक्कर काटने के बाद कुछ नहीं मिला। बहन साजिदा ने बताया परिवार ने कर्ज लेकर 16 लाख रुपये इलाज पर खर्च किए लेकिन भाई की जान नहीं बचा पाए। बबली की शादी के लिए भी सरकार के दरबार में बूढ़े पिता ने खूब चक्कर काटे लेकिन एक पाई की मदद नहीं मिली। इस समय बुजुर्ग माता-पिता और भाई-बहन कभी कांवड़ बनाकर तो कभी मेहनत मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण कर रहा है। लेकिन सरकारी मदद के नाम पर उन्हें कोई मदद नहीं मिली।