जिला जेल के कैदी कुशल कारीगर बनकर भी उभरे हैं। देश की जानी मानी वीआईपी कंपनी के लिए जॉब वर्क के तौर पर काम कर रहे 125 कैदियों ने सरकारी खजाने में 81 लाख का योगदान दिया है।
वर्ष 2010 में देश की जानी -मानी बैग कंपनी बनाने वाली वीआईपी का पहला कारखाना जेल परिसर में वजूद में आया था और अब यहां तीन कारखाने चल रहे हैं। जिला जेल की पहचान अब वीआईपी के कारखाने के तौर पर भी होने लगी है। कंपनी यहां अलग-अलग मॉडल के करीब 1800 बैग रोजाना बनते हैं और भविष्य में जेल प्रशासन का लक्ष्य रोजाना 4000 बैग बनाने का है।
शुरुआत में वीआईपी कंपनी ने ही कैदियों को बैग बनाने में दक्ष किया था। काम बढ़ने के साथ ही दक्ष कैदी ही ट्रेनर बन गए। अब यहां तीन यूनिट चल रही हैं। वर्ष 2010 से फरवरी 2017 तक कैदियों की मेहनत से करीब 81 लाख सरकार के खजाने में जमा हुए हैं। जेल कैंपस में वीआईपी के अल्फा, मैक्स, मिंट, पीसी लंगेज, स्काईबैग बनते हैं।
हर कैदी अपने काम को अच्छे से अंजाम दे रहा है। कारखानों में काम करने वाले कैदी व्यस्त रहते हैं। मकसद यही है कि वे जेल से निकलकर समाज की मुख्यधारा में वापसी कर सकें। वे एक अच्छे कारीगर की पहचान लेकर जेल से विदा होते हैं।- एसके सुखीजा, जेल अधीक्षक
वर्ष इतने बैग बनाए इतने कमाए
2010 92145 3.68 लाख
2011 155704 6.40 लाख
2012 173908 8.12 लाख
2013 126555 7.17 लाख
2014 169390 9.31 लाख
2015 173464 14.88 लाख
2016 179506 26.33 लाख
2017 39424 5.74 लाख
(फरवरी तक)