आज विश्व प्रवासी पक्षी दिवस है। पक्षियों में प्रवास अद्भुत प्राकृतिक प्रक्रिया है। विभिन्न प्रवासी पक्षी प्रवास के लिए हजारों मील की दूरी तय करते हैं। हरिद्वार में भीमगोडा बैराज, मिस्सरपुर गंगा घाट, झिलमिल झील एवं ऋषिकेश के पशुलोक बैराज पक्षियों के प्रवास के ठिकाने हैं। जलीय संरचना (वेटलैंड) वाले इन स्थानों पर दूसरे राज्यों और देशों के पक्षी आकर प्रवास करते हैं।
प्रवासी पक्षियों के शोधकर्ता ग्राफिक एरा समविश्वविद्यालय के शोधार्थी आशीष कुमार आर्य का कहना है कि जब पक्षियों के मूल निवास स्थान की झीलें और जलाशय बर्फ में तब्दील हो जाते हैं तब भोजन का संकट हो जाता है। पक्षी अपेक्षाकृत गर्म इलाकों को अपना बसेरा बनाते हैं और प्रवास के लिए निकलते हैं। जैसे ही मौसम अनुकूल हो जाता है तो लौट जाते हैं। हरिद्वार में 15 नवंबर के बाद से फरवरी तक प्रवासी पक्षियों का आगमन रहता है। दो से तीन महीने प्रवास करने के बाद पक्षी जिस रास्ते आते हैं उसी रास्ते से लौट जाते हैं। उन्होंने बताया कि प्रवासी पक्षी के एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास के लिए आवागमन का निश्चित मार्ग होता है। इसे फ्लाईवे कहते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में पहुंचने वाले अधिकतर पक्षी सेंट्रल एशियन फ्लाईवे और अफ्रीकन-यूरेशियन फ्लाईवे से उड़ान भरते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचते हैं।
प्रवासी पक्षियों में रुडी शेलडक, पोचार्ड, पिनटेल, वैगटेल, स्टोर्क, गल्स, पाइड अवोसेट, ग्रे लेग्ड गीज एवं राजहंस प्रमुख हैं। पक्षियों की ज्ञात प्रजातियों में 19 फीसदी पक्षी नियमित रूप से प्रवास करते हैं। प्रवासी पक्षी लंबी यात्रा से विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों को जोड़ने का काम करते हैं। उन्हें किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
संकटग्रस्त श्रेणी में 21 प्रजाति के पक्षी
विश्व में बीते 30 सालों में पक्षियों की 21 प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। वैश्विक स्तर पर पक्षियों की 192 प्रजातियों को अति संकटग्रस्त श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। इनमें भारत की तीन प्रजातियां ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिरैया), एशियाई हाथी और बंगाल फ्लोरिकन (बंगाल बस्टर्ड) शामिल है। बंगाल फ्लोरिकन को खरमोर नाम से भी जाता है। प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने परियोजना भी बनाई है।