वासंतिक नवरात्र का बृहस्पतिवार को छठा दिन था। देवी के कई पौराणिक और नए मंदिरों में भगवती की आराधना की गई। बृहस्पतिवार को श्रद्घालुओं ने देवी के कात्यायनी स्वरूप का पूजन किया। शुक्रवार को देवी के कालरात्रि स्वरूप की पूजा अद्र्धरात्रि तक की जाएगी।
धर्मनगरी के मंसा देवी, चंडी देवी, सुरेश्वरी देवी तथा अधिष्ठात्री मायादेवी के मंदिरों में भक्तों की भीड़ दिनभर लगी रही। मतदान का दिन होने के बावजूद श्रद्धालु देवी के दर्शन को मंदिरों में पहुंचे। देवी का कात्यायनी ही अकेला ऐसा स्वरूप है, जो पिता ऋषि कात्यायन के गोत्र से चलता आ रहा है। यह स्वरूप स्त्री की अधिष्ठात्री शक्ति का प्रतीक है। कनखल के महिषासुर मर्दनी, मां तारा, बगुला मुखी और शीतला माता के मंदिरों में भी भक्तों की काफी भीड़ गुरुवार को लगी रही। सुरेश्वरी देवी मंदिर में चल रहे शत चंडी यज्ञ में सैकड़ों नगरवासियों ने भाग लिया। भक्तों ने यज्ञ में आहुतियां प्रदान की। ऐसा ही यज्ञ चंडी देवी मंदिर में भी चल रहा है।
शुक्रवार को देवी की सप्तम कालरात्रि मनाई जाएगी। इस दिन गंगा पार के दक्षिण काली मंदिर, कनखल बगुला मुखी और तारा मंदिरों में विशेष आयोजन होंगे। भीमगोड़ा के काली मंदिर में भी सैकड़ों भक्त जाकर प्रसाद चढ़ाएंगे। कालरात्रि स्वरूप की अर्द्घरात्रि में पहले पशु बली देने की की परंपरा थी। यह परंपरा अब उत्तराखंड में समाप्त हो गई है। प्रतीकात्मक रूप से पेठे अथवा कद्दु की बली कालरात्रि की अर्द्घरात्रि को प्रदान की जाएगी। इस रात्रि में नारियल की बली भी देवी को चढ़ाई जाती है।