हरिद्वार।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डा. चिन्मय पंड्या ने कहा कि भारतीय संस्कृति के सूत्रों को जीवन में अपनाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ी जा सकती है।
यह बात उन्होंने देवसंस्कृति विश्वविद्यालय व इंडियन काउंसिल ऑफ फिलोसफिकल रिसर्च (आईसीपीआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वैदिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत एवं समकालीन जीवन विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन पर कही। इस शिविर में देवसंस्कृति विवि, गुरुकुल कांगड़ी विवि, पतंजलि विवि, उत्तराखंड संस्कृति विवि के छात्र-छात्राओं ने अपने शोधपत्र पढ़े।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे देसंविवि के प्रतिकुलपति डा. चिन्मय पंड्या ने कहा कि प्राचीन काल में शत्रु हमारे निकट दिखाई देने वाले होते थे। जिससे प्रत्यक्ष रूप से सावधान रहते थे। आज वे हमारे चिंतन, चरित्र एवं जीवनशैली में घुस गए हैं। इनसे बचने के लिए भारतीय संस्कृति के वैदिक ज्ञान, उपनिषद आदि के सूत्रों को जीवन में उतरना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है, जिसके सूत्रों को अपनाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ी जा सकता है। उन्होंने युवाओं को भारतीय संस्कृति के सूत्रों जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
आईसीपीआर के सचिव रजनीश कुमार शुक्ला ने कहा कि आज विज्ञान और तकनीक के इतने विकास के बावजूद शांति नहीं है, क्योंकि हम वैदिक ज्ञान-विज्ञान, शास्त्र, संस्कृति आदि के मूल तत्व को भूला बैठे है।
इससे पूर्व देसंविवि के कुलपति शरद पारधी ने कहा कि वेद सिर्फ ग्रंथ या किताब नहीं है, यह ज्ञान का प्रतीक है जो शुद्ध निर्मल ह्दय में प्रकट होता है। द्वितीय सत्र में डा. जयदेव वेदालंकार ने वैदिक ज्ञान-विज्ञान की सनातन अवधारणा के बारे में बताया। संगोष्ठी के समन्वयक प्रो. सुरेश वर्णवाल ने बताया कि दो दिवसीय संगोष्ठी में आईसीपीआर के नियमों के तहत चयनित कुल सत्रह पेपर पढ़े गए। समापन सत्र के अवसर पर शोधार्थी के शोधपत्र की ई-प्रोसिडिंग का विमोचन किया गया। इस दौरान पर गुरुकुल कांगड़ी विवि के योग विभागाध्यक्ष डा. ईश्वर भारद्वाज, प्रो. सुखनंदन सिंह, डा. ज्ञानेंद्र पांडेय, डा. वंदना श्रीवास्तव, डा. पीयूष त्रिवेदी, डा. इंदु शर्मा, डा. गोविंद मिश्र आदि मौजूद रहे।
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युवावस्था कुरीतियों से संघर्ष का समय
हरिद्वार। गीता पर आयोजित विशेष कक्षा को संबोधित करते हुए देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि भगवान हमारे कण-कण में निवास करते हैं। वे अप्रत्यक्ष रूप से मार्गदर्शन करते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। मनुष्य को सदैव अपने कर्म में निरत रहना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को सदैव भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए, जिससे वे सदा ऊंचे आदर्शों के लिए अपना समय लगा सकें। उन्होंने कहा कि वासनाओं और तृष्णाओं से मुक्त होकर जीवन जीना चाहिए और यही जीवन जीने की सर्वोत्तम कला है। उन्होंने कहा कि युवावस्था झूठ, भ्रष्टाचार, अनीति जैसी कुरीतियों से संघर्ष का समय होता है। इस अवसर पर कुलपति शरद पारधी, प्रतिकुलपति डा. चिन्मय पंड्या, कुलसचिव संदीप कुमार आदि मौजूद थे