अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि परिवर्तन ही प्रकृति का आधार है। जो साधक इन परिवर्तनों को प्रत्येक परिस्थिति में शरीर, मन, भावनाओं से एकाग्र एवं दृढ़ता पूर्वक समभाव रहकर सहन करता है वह तितिक्षा रूपी संपत्ति का स्वामी बन जाता है।
विवि के मृत्युंजय सभागार में आयोजित सत्संग में नवरात्र साधना में जुटे युवाओं को संबोधित करते हुए डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि तप-साधना करने से तितिक्षा प्राप्त होती है। तितिक्षा का मूल गुण. शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्तरों पर सकारात्मक रूप से रूपांतरण लाती है। रामचरित मानस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भरत ने प्रभु श्रीराम के प्रति स्वयं को समर्पित कर तितिक्षा पूर्ण जीवन व्यतीत किया। भक्त प्रहलाद ने तितिक्षा की कसौटी में बँधकर साधना की। डा. पंड्या ने कहा कि मोहग्रस्त व्यक्ति किसी के सुख-दु:ख को समझ नहीं पाता। जब हम मोह में फंसते हैं तब चाहे कितनी भी पूजा पाठ कर लें, वह व्यर्थ ही जाती है। मोह में हम अनीति को भी बर्दाश्त कर लेते हैं और भ्रम में जीने लगते हैं। उन्होंने कहा कि सबल गुरु के संरक्षण में मनोयोगपूर्वक की साधना से मोह कम होता है और आत्म उन्नति होती है। कहा कि केवल माला जपने से साधना पूरी नहीं होती, वरन उसके भाव का चिंतन, मनन व जीवन में उतारने से समुचित फल मिलता है।