हरिद्वार। वैष्णव संप्रदाय के सर्वोच्च पद पर आसीन जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज अध्यात्म जगत के प्रणेता थे। उन्होंने जीवन भर सनातन धर्म के उच्च मानदंडों का अनुसरण किया। वह हरिद्वार के संत जगत के अलावा सामान्य लोगों के बीच भी बेहद लोकप्रिय थे। अकेले हरिद्वार में ही उनके शिष्यों की संख्या हजारों है।
जानकारी के अनुसार स्वामी हंसदेवाचार्य की पार्थिव देह शुक्रवार रात ही हरिद्वार पहुंच जाएगी। भीमगोड़ा के जगन्नाथ धाम में उनकी देह लोगों के दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए रखी जाएगी। बड़ी संख्या में देशभर से उनके अनुयायी हरिद्वार पहुंचने लगे हैं। बताया जाता है कि कई बड़े संत और नेता भी उनकी अंत्येष्टि में शामिल होंगे। स्वामी हंसदेवाचार्य को खड़खड़ी श्मशान घाट पर शाम चार बजे मुखाग्नि दी जाएगी।
2010 में आसीन हुए थे जगद्गुरु रामानंदाचार्य की पद पर
स्वामी हंसदेवाचार्य का जन्म हरियाणा में झज्झर जिले के दुजाना गांव में हुआ था। हंसदेवाचार्य जब तक रामानंदाचार्य पद पर आसीन नहीं हुए थे, जब तक हरिद्वार में उन्हें स्वामी हंसदास के नाम से जाना जाता था। बालपन में ही वे हरिद्वार चले आए और चेतन ज्योति विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। हरिद्वार में नगर पालिका अध्यक्ष रहे सतपाल ब्रह्मचारी उनके बाल सहपाठी हैं। स्वामी हंसदास ने अनेक गुरु धारण किए। वे ऋषिकेश के स्वामी जगन्नाथ के शिष्य बने। बाद में जगन्नाथ धाम के नाम से उन्होंने कई आश्रम बनाए। स्वामी हरिदास से उन्होंने मंत्र दीक्षा ली थी। स्वामी पूर्णनाथ और कृष्णानंद भी उनके गुरु थे। स्वामी हंसदास पहले उदासियों के बड़े अखाड़े से जुड़े और उस अखाड़े के महामंडलेश्वर बने। बाद में वैष्णव संप्रदाय अपनाकर स्वामी हंसदास बैरागी अणियों से जुड़ गए। उनका नाम हंसदेवाचार्य हो गया। वैष्णव संप्रदाय ने वर्ष 2010 के हरिद्वार कुंभ में उन्हें अपना सर्वोच्च पद जगद्गुरु रामानंदाचार्य प्रदान किया। स्वामी हंसदेवाचार्य की गहरी पैठ संघ परिवार में थी। देश की जानी-मानी राजनीतिक हस्तियां उनसे आशीर्वाद लेने हरिद्वार आती थी। राम जन्मभूमि के आंदोलन में स्वामी हंसदेवाचार्य का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। हाल ही में उन्होंने प्रयाग में हुई विहिप की धर्म संसद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।