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सौर वर्ष में प्रत्येक माह बदल जाते हैं सूर्य के नाम

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
भगवान भास्कर शनिवार को मीन राशि त्यागकर मेष में प्रवेश करेंगे। साथ अश्विन नक्षत्र में प्रवेश से सौर वर्ष प्रारंभ होगा। इस सौर वर्ष में प्रत्येक माह सूर्य नई राशि में जाते हैं और उनके नाम भी उसी तरह बदल जाते हैं। राशि और नक्षत्र प्रवेश मास का नाम तय करेंगे। इस बार विशेष बात यह है कि एक माह ऐसा आएगा, जिसमें संक्रांति ही नहीं पड़ेगी। इस पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व होगा।
मेष में जब सूर्य प्रवेश करते हैं, जब उनका नाम मित्र हो जाता है। ज्योतिष के अनुसार वृष की संक्रांति में सूर्य को रवय, मिथुन संक्रांति में सूर्य, कर्क संक्रांति में भानू, सिंह संक्रांति में ख्रग, कन्या संक्रांति में पुण्य, तुला में हिरण्यगर्भ, वृश्चिक में मारिच, धनु में आदित्य, मकर में सावित्र, कुंभ में अर्क तथा मीन में भास्कर कहा जाता है। इन 12 सूर्यों को मिलाकर वर्ष के द्वादश सूर्य बनते हैं।
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डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार मेष की संक्रांति में 12 सूर्यों का प्रभाव एक साथ पड़ता है। यहीं कारण है कि सूर्य की ऊर्जा बहुत बढ़ जाती है जो जल के समीप होने पर अधिक प्राप्त होती है। यही कारण है कि गंगा में स्नान करने लाखों श्रद्धालु तीर्थों पर एकत्रित होते हैं। इसी प्रकार सूर्य जब सिंह राशि में आते हैं, जब सात सूर्यों का पूर्ण प्रभाव देखने को मिलता है। वर्णन आया है कि मेष संक्रांति पर 12 रूप उपस्थित होने से सभी 12 सूर्यों की आराधना एक ही दिन में की जा सकती है। 12 सूर्यों के नाम जपने से अनेक प्रकार के संकट टलते हैं। संक्रांति का प्रकार व्यक्ति के रोगों पर भी पड़ता है।
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14 अप्रैल को मेष में संक्रमण प्रात: 8:10 बजे होगा और दोपहर 2:34 बजे तक बना रहेगा। यह स्नान का मुख्य पर्व काल है। इस स्नान करने से अनेक दोष दूर हो जाते है। संक्रांति के समय दिया गया दान स्थायी हो जाता है। शनिवार के दिन शनि के ही नक्षत्र में सूर्य का आगमन और भी शुरु हो गया है। सूर्य दर्शन करके यदि गंगा में शहद, जल, दूध, शर्करा और पुष्प चढ़ाए जाए तो दरिद्रता मिट जाती है।
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