उत्तराखंड में वन्यजीव अपराध पर अंकुश लगाने के लिए जंगलात महकमे के पास कोई रणनीति ही नहीं है और फिर रही-सही कसर बजट के अभाव ने निकाल दी। उधर स्टाफ की कमी के चलते इसका नेटवर्क भी चरमरा गया है। ऐसे में वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर महकमे की कार्यशैली सवालों के घेरे में है।
अधिकारियों को भनक तक नहीं
प्रदेश में गुलदार, बाघ और अन्य वन्यजीवों के शिकार की घटनाएं नहीं थम रही हैं। लेकिन महकमे के अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाती। नेटवर्क न होने से महकमा इस बाबत खुफिया जुटा पाने में नाकाम साबित हो रहा है।
इस बीच सरकार ने वन्यजीव अपराध को रोकने के लिए एंटी पोचिंग सेल का गठन कर अपर प्रमुख वन संरक्षक एसके दत्ता को इसका प्रभारी भी बना दिया लेकिन बजट और स्टाफ के नाम पर कुछ भी नहीं है। इसी का नतीजा है कि प्रदेश में लगातार वन्यजीव अपराध की घटनाएं हो रही हैं और महकमा तमाशबीन बना हुआ है।
निशाने पर बाघ, गुलदार, भालू और हिरन
प्रदेश में वन्यजीव अपराध पर अंकुश लगाने के लिए गोपेश्वर, कोटद्वार और धारचूला में एक-एक वार्डन की तैनाती का प्रस्ताव था। प्रत्येक वार्डन के नीचे एक-एक रेंजर, फारेस्टर और दो-दो फारेस्ट गार्ड की तैनाती की जानी थी।
इनकी मानीटरिंग एंटी पोचिंग सेल के हेड के जिम्मे थी। इसको लेकर छह माह पहले राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव भी पास हो गया लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं आया।