शायद बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि स्वास्थ्यवर्द्धक के रूप में घर-घर में इस्तेमाल होने वाले च्यवनप्राश की आठ मूल औषधियां लुप्त होने की कगार पर हैं।
अब इनकी जगह वैकल्पिक औषधियों का इस्तेमाल हो रहा है, जिनमें ताकत देने की वैसी क्षमता नहीं है। कभी करीब 34 औषधियों से बनने वाले इस च्यवनप्राश की चर्चा चरक संहिता में हुई थी, लेकिन बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के चलते मूल औषधियों पर संकट आ गया है।
नेशनल इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन (नीमा) के प्रतिनिधि और द्रव्यगुण में एमडी डाक्टर विनय खुल्लर ने बताया कि च्यवनप्राश की मूल औषधियों में अष्टवर्ग की औषधियां विलुप्त हो गई हैं। इसमें जीवक, ऋषभक, मेदा, मदामेदा, काकोली, क्षीर का कोली, ऋद्धि और बुद्धि औषधियां आती हैं।
इनके स्थान पर अब शतावरी, अश्वगंधा, वराहीकंद और विदारी कंद का प्रयोग हो रहा है। इससे च्यवनप्राश की गुणवत्ता 10 प्रतिशत तक प्रभावित हो रही है।
इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस बीएचयू में द्रव्यगुण विभाग के अध्यक्ष डाक्टर अनिल सिंह का कहना है कि इनके लुप्तप्राय होने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। इन्हें दोबारा उगाने के प्रयास चल रहे हैं। यह काम गढ़वाल के चकराता के देवबंद नर्सरी में किया जा रहा है।
दूसरी तरफ लंबे समय से जड़ी-बूटी पर काम करने वाले पूर्व वन दारोगा उमेश पंत कहते हैं कि उन्होंने 60 साल से च्यवनप्राश में इस्तेमाल होने वाली अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियों को नहीं देखा है।
अष्टवर्ग के पौधों की उपलब्धता कम
पतंजलि योग पीठ के वैद्य व महामंत्री आयार्य बालकृष्ण के अनुसार अष्टवर्ग की तमाम औषधियां भारत में मौजूद हैं। 300 वर्षों से औषधियों के बारे में खोज नहीं हुई और भ्रम बना रहा। अष्टवर्ग के पौधों की उपलब्धता कम होने तथा औषधियों का निर्माण बड़े पैमाने पर होने के कारण शतावरी, अश्वगंधा आदि प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग किया जा रहा है।
‘तराई और पहाड़ में तीन-चार दशक पहले तक मिलने वाली जड़ी-बूटियां नदारद हो रही हैं। पिथौरागढ़, मुनस्यारी, तुंगनाथ जैसे क्षेत्रों में जीवक, ऋषभक, काकोली, पटकी, सातमपंजा, अतनिस जैसी कई औषधियां पाई जाती थीं और आसानी से मिलती थीं। जंगल में इन्हें मुफ्त मिलता देख लोगों ने उखाड़कर बेचना शुरू कर दिया और अब ये औषधियां दुर्लभ हो गई हैं। पहले एक ट्रिप में 50-60 जड़ी बूटियां मिल जाती थीं लेकिन अब 2-3 पौधे मिल जाएं तो बहुत हैं।’- डॉ. अजय कुमार रावत, वरिष्ठ वैज्ञानिक, नेशनल बॉटेनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ
इन औषधियों का होता है प्रयोग
च्यवनप्राश को तैयार करने में बेल, गनियार, गम्भारी, पाढल की छाल के अलावा बरियश मूल, सरिवन, पकिवन, वनमूंग, वनउड़द, पीपर, गोक्षरू, वनभष्टा, भटकैया, काकड़ासिंगी, भूमिआंवला, मुनक्का, जीवंती, पुष्करमूल, कालाअगर, बड़ी हरड़, गुड्ची, बड़ी इलायची, लाल चंदन, नील कमल, आडूसा की पत्ती, जीवक, ऋषभक, मेदा, मदामेदा, काकोली, क्षीर का कोली, ऋद्धि, बुद्धि और सबसे अधिक मात्रा में आंवले का प्रयोग होता है। गाय का घी, खांड की चाशनी, शहद, वंशलोचन, दालचीनी, तेजपत्ता, नाग केसर भी मिलाए जाते हैं। इनमें कई औषधियां हिमालयी क्षेत्र में मिलती हैं।