उत्तराखंड में आई आपदा ने 736 प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसमें 131 प्राथमिक और 28 जूनियर हाईस्कूल पूरी तरह से ढह चुके हैं, जिससे बच्चों को स्कूल के लिए कई किलोमीटर की पैदल दूरी नापनी पड़ रही हैं।
वही सैकड़ों बच्चे पंचायत एवं जर्जर स्कूल भवनों में पढ़ने को मजबूर हैं, लेकिन शिक्षा विभाग और शासन बच्चों के भविष्य से बेपरवाह है। तभी तो आपदा के 109 दिन बाद अब जाकर ढह चुके स्कूलों के पुनर्निर्माण के लिए डिजाइन तैयार हो पाया है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भवन कब तक बनकर तैयार होंगे।
पंचायत भवनों में चल रहे स्कूल
आपदा में स्कूल ढहने से न सिर्फ रुद्रप्रयाग बल्कि पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी और बागेश्वर आदि जनपदों में कई विद्यालय सामुदायिक एवं पंचायत भवनों में चल रहे हैं।
स्थिति यह है कि जान जोखिम में डालकर बच्चे जर्जर हाल स्कूलों में पढ़ रहे हैं। कुछ जनपदों में तो स्कूल ढहने के बाद से बच्चे स्कूल ही नहीं जा पा रहे हैं, लेकिन आपदा के सौ दिन बाद भी बच्चों के लिए स्कूल भवन की व्यवस्था नहीं हो पाई है।
लंबी माथापच्ची के बाद अब कहीं जाकर विभाग ने सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट रुड़की (सीबीआरआई) से आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए स्कूल भवन का डिजाइन तैयार करवाया है। एसएसए राज्य परियोजना कार्यालय ननूरखेड़ा में शुक्रवार को इसके लिए ग्रामीण अभियंत्रण सेवा (आरईएस), सीबीआरआई और प्रत्येक जनपद से शिक्षा विभाग के सहायक अभियंताओं को बुलाकर स्कूल डिजाइन को फाइनल रूप दिया गया।
कहां किस तरह का खतरा
रुद्रप्रयाग के प्राथमिक विद्यालय भणगा में 33
बच्चे हैं, स्कूल भवन की भूमि धंस रही हैं। इसके अलावा तलवाड़ा में 14
बच्चे हैं, भटवाड़ी में 36, भेलुंता में नौ, पाली में 39, उच्छना में 62,
किरोडा तल्ला में 38, बक्सीर में 61 सहित विभिन्न विद्यालयों में सैकड़ों
बच्चे हैं, जहां भूमि धंसने से स्कूल भवन ढहने की कगार पर है।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में किस तरह के स्कूल भवन बनाए जाएंगे, यह लगभग फाइनल हो चुका है। एसएसए राज्य परियोजना कार्यालय में स्टेट लेबल कमेटी की बैठक में डिजाइन को लेकर जो थोड़ी बहुत आपत्तियां थी, उसे ठीक करने के लिए कहा गया है।
-कुसुम पंत, SSA
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्कूल भवनों के निर्माण में इस तरह की तकनीकी का इस्तेमाल किया जाएगा जो सभी आपदाओं को झेल सके। आरसीसी लिंटर की जगह अब छत पर टीन शेड का प्रयोग किया जाएगा। वहीं किचन में स्मोक लैस चूल्हे होंगे।
- एके मित्तल, वैज्ञानिक
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