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केदारनाथः गलतियों को रहस्य का कफन ओढा रही सरकार

Sat, 06 Jul 2013 04:31 PM IST
रुद्रप्रयाग/ब्यूरो
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हजारों लोग जो कि अभी भी लापता हैं या फिर इस दुनिया में ही नहीं हैं, उनकी मौत रहस्य बनकर ही रह जाएगी। अभी भी केदारनाथ में आई आपदा की इस त्रासदी के पीछे के वाजिब कारण ढूंढने और गलतियों को मानने के बजाय सरकार इसे रहस्य बनाने में ही आमादा है।
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पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी भले ही अब केदारघाटी में आई जल प्रलय से पहले ही सबको सचेत करने की बात कर रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि प्रशासन ने इसे गंभीरता से ही नहीं लिया। यहां तक कि तत्कालीन डीएम विजय ढौंडियाल को भी विश्वास में नहीं लिया गया।

पुलिस और शासन के अधिकारी अपनी-अपनी ओर से आपरेशन चलाते रहे। पुलिस द्वारा मीडिया को भी सही जानकारी नहीं दी गई। यदि 15 जून की शाम को पुलिस मीडिया को सही जानकारी दे देती, तो समय पर जमीनी स्तर से बचाव कार्य शुरू हो जाते। लेकिन 16 जून की शाम तक पुलिस-प्रशासन यही रट लगाए रही कि सिर्फ 10 लोगों की ही जान गई है।
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काश्ा सुनते जवान की बात
अब जबकि आपदा के बाद उपजी बदहवाशी से लोग उबर रहे हैं, तब आपदा और सरकार को लेकर नए सवाल भी ख्ाड़े होने लगे हैं। अधिकारी 16 जून की शाम रामबाड़ा से पुलिस के जवान द्वारा रेडियो सेट पर दिए गए संदेश को सही मानने को तैयार ही नहीं थे। जवान ने संदेश दिया था कि रामबाड़ा में 40-50 लोग बह गए हैं और वह भी चौकी छोड़कर जा रहा है। हालांकि अंत में प्रशासन ने यही संदेश शासन को भेजा।

जगह-जगह से मिल रही सूचनाओं के आधार पर मीडिया ने मृतकों की संख्या सैकड़ों में होने की जानकारी दी। इसको भी नकार दिया गया, लेकिन अंत में पुलिस-प्रशासन को मानना पड़ा कि सैकड़ों लोग मारे गए हैं।

सरकार की सुस्ती से गई जान
शुरू में बताया गया कि केदारनाथ में लगभग 700 यात्री फंसे हुए हैं। जबकि मोटर मार्ग पर स्थित पड़ावों में लगभग चार हजार यात्री बता गए। जब केदारनाथ और यात्रा पड़ावों पर रेस्क्यू आपरेशन हुआ, तो सही संख्या सामने आ गई।

केदारनाथ आपदा के दौरान आपदा में फंसे अधिवक्ता बताते हैं कि मैंने 17 जुलाई की सुबह 6.38 बजे और 6.41 बजे फोन कर पुलिस और प्रशासन को हादसे की जानकारी देते हुए मेडिकल टीम भेजने की मांग की थी। यदि समय पर राहत कार्य होता, तो कई लोगों की जान बच सकती थी।

बहरहाल इस पूरे मुद्दे पर सरकार की ओर से अब तक हुई कार्रवाई तो यही बयां कर रही है, कि सरकार अपने आपदा प्रबंधन के बीमार ढांचे को दुरुस्त करने के बजाय आगे भी ऐसी ही और आपदाओं का इंतजार कर रही है।
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