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सेब के पेड़ की कमर तोड़ रहा ‘कैंसर’

Tue, 03 May 2016 01:56 PM IST
भूपेश कन्नौजिया / अमर उजाला, मुक्तेश्वर(नैनीताल)
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नैनीताल जिले में रामगढ़ सहित ओखलकांडा और धारी ब्लॉक में मौसम की मार से झेल रहे सेब उत्पादकों के सामने एक नई दिक्कत पैदा हो गई है। फलपट्टी क्षेत्र में सेब के पेड़ों के तनों में एक रोग नजर आ रहा है, जिसे तने का कैंसर कहते हैं। इसे लेकर सेब उत्पादक खासे परेशान हैं।
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केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान के डा. राजनारायण व डा. अनिल कुमार ने बताया कि मौसम के बदले मिजाज के चलते इस बार सेब की पैदावार कम होनी होगी। ऊपर से तना कैंसर भी पौधों में नजर आने लगा है। उन्होंने बताया कि तना कैंकर को काला तना, भूरा तना और गुलाबी तना से पहचाना जा सकता है।

काफी तेजी से यह बीमारी फैल रही है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी की पहचान सेब उत्पादक अपने सेब की शाखाओं एवं मुख्य तनों की फटी हुई छाल को देखकर लगाया जा सकता है। इस बीमारी के लगने से पेड़ की छाल फट जाती है और तना धीरे-धीरे सूखने लगता है। यह बीमारी कोत्रियोस्फेटिया रीबिस एवं कोनियोपोसियम कोमेटास्पेरम नामक फफूंद के माध्यम से  फैलती है जो पौधों के कटे भाग अथवा खुले घावों द्वारा तनों में प्रवेश करती है।
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कटाई-छंटाई के बाद कटे भागों एवं कृषि कार्यों के दौरान औजारों से वृक्षों पर लगे घावों पर फंफूदीनाशक लेप व चौबटिया लेप लगा कर पेड़ को बचाया जा सकता है। मुक्तेश्वर स्थित केंद्र में एक शोध में सामने आया है कि पौधों में सुरक्षा कवच के रूप में काम करने वाली माइकोराजा फफूंद जो पौधे का सुरक्षा कवच का काम करती है।

ग्लोमस और आक्लोस्पोरा नामक फफूंद पर अनुसंधान चल रहा है। शोध में इस फफूंद के उपयोग से सेब के पौधों मे वृद्धि ज्यादा हुई एवं उन पर इस व्याधि का प्रकोप अपेक्षाकृत काफी कम रहा। वैज्ञानिक डा. अनिल व डा. राजनारायण का कहना है कि संस्थान इस फफूंद को और प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि काश्तकारों को संकट से उबारा जा सके। उनका कहना है कि फिलहाल इस प्रक्रिया में अभी थोड़ा समय लग सकता है।

सूक्ष्म जीव माइक्रोराजा फफूंद है, जो पौधे को सुरक्षा कवच का काम करती है। इसमें ग्लोमस और अक्लोस्पोरा फंजाई खास तौर पर सक्रिय होती है और जब इस खाद और कीटाणुनाशक लेप के साथ मिलाया जाता है तो पौधे को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। साथ ही जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है। फिलहाल इस पर विस्तृत शोध कार्य चल रहा है और जल्द ही काश्तकारों को आसानी से उपलब्ध कराए जाने के प्रयास चल रहे हैं।
 
आम पर मैंगोहॉपर कीट का धावा
नाचनी (पिथौरागढ़) में रामगंगा घाटी के प्रसिद्ध आम पर इस बार मैंगोहॉपर कीट ने जबरदस्त धावा बोल दिया है। इस कीट को नहीं रोका गया तो तल्लाजोहार में पैदा होने वाले एक हजार क्विंटल आम के व्यवसाय पर इसकी मार पड़ेगी। इसके अलावा आम के पेड़ों पर सूखे की भी मार पड़ रही है। ऐसे में पहाड़ ही नहीं, बल्कि मैदान के लोगों को भी रामगंगा घाटी का स्वादिष्ट आम चखने को नहीं मिलेगा।

रिंगूनिया, नाचनी, भैंसखाल, आमधार, टिम्टिया, क्वीटी में आम के बौरों पर कीट की मार पड़ रही है। इलाके में दशहरी, लंगड़ा, फजरी, चौसा, स्थानीय प्रजाति का आम पैदा होता है। इन इलाकों में आम के एक हजार से अधिक पेड़ हैं। हर साल एक एक हजार क्विंटल आम पैदा होता है। इस साल फसल, ठीक थी तो कीटों के हमले, सूखे के कारण पेड़ सूखने से आम उत्पादक बेहद परेशान हैं।

किसानों ने बताया कि यह कीट बौर के रस को चूस कर बौर को मार रहा है। जिससे फल बनने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है। यह कीट आम के पेड़ के लिए भी बेहद घातक है। इस कीट का मल बहुत चमकीला है और इसमें मिठास भरा पदार्थ रहता है। ये पदार्थ पेड़ की पत्तियों पर चिपक जाता है। पत्तों पर तमाम पतंगे, मधुमक्खी मंडराने लगते हैं।

इनका मल पत्तों को काला कर देता है।  पेड़ के लिए खतरा बन जाता है। पेड़ सूखने लगते हैं। आम उत्पादक त्रिलोक सिंह सामंत, दान सिंह सामंत, पूरन सिंह सामंत, गंगू चंद, हीरा सिंह दानू, गोविंद सिंह, रतन सिंह चुफाल ने कहा कि कीटों पर रोकथाम न गई तो उनकी आम की फसल चौपट हो जाएगी। हर परिवार को हजारों रुपये का नुकसान होगा।

आम को बचाने के लिए नाचनी क्षेत्र में मोबाइल टीम भेजी जा रही है। रोग नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस दवा का छिड़काव किया जाएगा।
- डॉ. मीनाक्षी जोशी जिला उद्यान अधिकारी

बौर आने के समय फरवरी, मार्च के प्रथम, द्वितीय सप्ताह कीट का पनपना शुरू होता है। नाव के आकार का यह कीट 6 एमएम लंबा, 4 एमएम चौड़ा होता है। कीट पर नियंत्रण नहीं किया गया तो फसल चौपट हो जाएगी। मोनोक्रोटोफॉस दवा दो एमएल पर लीटर की दर से 15-15 दिन के अंतराल में छिड़काव करने से कीट का प्रभाव खत्म हो जाता है।
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- डॉ. एके सिंह, मैंगो स्पेशलिस्ट पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय
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