शास्त्रों ने श्राद्ध पक्ष में चतुदर्शी का दिन उन पुरखों के लिए नियत किया है, जिनकी मृत्यु अकाल हो गई हो।
मान्यता है कि चतुदर्शी के दिन ऐसे लोगों का श्राद्ध करने से जहां पितृ प्रसन्न होते हैं, वहीं मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है। इस बार चतुदर्शी का श्राद्ध तीन अक्तूबर को पड़ रहा है।
युवावस्था मृत्यु आदि को अकाल मृत्यु मानने लगे
यूं तो कई धर्म शास्त्र अकाल कुछ भी नहीं मानते। प्रत्येक मृत्यु को सकाल माना गया है। अलबत्ता धरतीवासी दुर्घटना मृत्यु, विषपान मृत्यु, अग्नि कांड मृत्यु, युवावस्था मृत्यु आदि को अकाल मृत्यु मानने लगे हैं।
जिन परिवारों में ऐसी मृत्यु हो गई हो वहां अकाल मृत्यु से मरे पुरखे का श्राद्ध चतुदर्शी को किया जाना चाहिए। इसी प्रकार माता का श्राद्ध तिथि के ज्ञात नहीं होने पर नवमी को किया जाता है।
संन्यासी का श्राद्ध द्वादशी के दिन
परिवार में किसी से संन्यास ले लिया हो तो उसका श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है। पुरखों की तिथि याद न हो तो अमावस्या के दिन सभी पितरों को श्राद्ध कर विदा कर दिया जाता है।
भारतीय प्राच्य विद्या सोसाइटी के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार जिन परिवारों में प्रेत अथवा पितर बाधा हो वे परिवार चतुदर्शी और अमावस्या दोनों दिनों का चयन श्राद्ध के लिए कर सकते हैं।
चतुदर्शी और अमावस्या का श्राद्ध
स्वप्न में मृत्यु अथवा सर्प दिखाई दे तो अमुक पितृ का श्राद्ध चतुदर्शी के दिन किया जाना चाहिए। इस बार चार अक्तूबर को सूर्य का नक्षत्र उत्तराफाल्गुनि पड़ रहा है। फलस्वरूप चतुदर्शी और अमावस्या का श्राद्ध पितरों की तृप्ति की दृष्टि से और अधिक फलदायी हो गया है।