गुमदेश क्षेत्र का मडलक बड़े एरिया को कवर करता है, लेकिन यह इलाज में फिसड्डी है। एलोपैथिक अस्पताल यहां है नहीं। मडलक में इलाज का एकमात्र सहारा आयुर्वेदिक अस्पताल का है, लेकिन इसमें भी साधन और सुविधाओं की कमी है। एलोपैथिक अस्पताल की कमी इमरजेंसी में तो सिरदर्द बन ही रही है, साथ ही गर्भवती महिलाओं को भी लोहाघाट जाने की मजबूूरी होती है।
चंपावत से 41 किमी दूर मडलक में आयुर्वेदिक अस्पताल ही मरीजों के दर्द को दूर करने का अकेला सहारा है। अमर उजाला जब मडलक पहुंचा, तो अस्पताल में सन्नाटा था। डा.अजय रस्तोगी और फार्मेसिस्ट संजोग कुमार जरूर मुस्तैद थे, लेकिन मरीज नहीं थे।
मौसम की खराबी भी लोगों को घर से बाहर नहीं निकलने दे रही थी, लेकिन इससे बड़ी बात यह कि इलाज से तत्काल लाभ नहीं मिलने की वजह से लोगों का खास रुझान इस ओर नहीं था, और जो मरीज अस्पताल पहुंचते भी हैं, वो सिर्फ मजबूरी में। मई में 350 नए मरीजों सहित कुल 600 मरीज पहुंचे। अस्पताल की भी अपनी समस्याएं हैं। सफाई कर्मी नहीं हैं। मार्च में रिटायरमेंट के बाद से वार्डब्वाय का पद भरा नहीं जा सका।
गुमदेश क्षेत्र के लेटी, सुंगरखाल, जमरसौ, मंझपीपल, बगौटी, रौसाल, सुनकुरी सहित काफी गांवों के लोगों का सपना अच्छे इलाज का है। इसे लेकर यहां के लोग कई बार आवाज भी उठा चुके हैं, लेकिन एलोपैथिक अस्पताल नहीं होने से उनकी यह आस अधूरी है।
आयुर्वेदिक पद्धति बेशक बगैर साइड इफैक्ट के इलाज करती है, लेकिन इसमें अधिक वक्त लगने से यह लोगों की पहली पसंद नहीं है। तत्काल राहत के अलावा दुर्घटनाओं और गर्भवती महिलाओं के लिए यहां कोई सहारा नहीं है। अलबत्ता मडलक में 2008-09 में 26 लाख रुपये से आयुर्वेदिक अस्पताल का भवन बना, लेकिन स्टाफ की कमी से भवन का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।
ग्रामीण कहते हैं कि आयुर्वेदिक अस्पताल उनकी जरूरतों को पूरा करने में नाकाफी है। जगदीश धौनी, राजेंद्र धौनी का कहना है कि अस्पताल को बेहतर किया जाना चाहिए। वहीं कृष्णानंद पांडेय अस्पताल में दवाओं की कमी और कई अन्य व्यवस्थाओं से संतुष्ट नहीं थे।