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दो करोड़ की लागत से टनकपुर, लोहाघाट में बने जिले के ट्रॉमा सेंटर हुए शोपीस

Thu, 09 Jun 2016 10:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
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लोहाघाट का ट्राॅमा सेंटर - फोटो : अमर उजाला
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चंपावत। तीन दिनों से ब्लड बैंक को लेकर जिले में उबाल है, लेकिन इस्तेमाल न आने वाली स्वास्थ्य विभाग की यह अकेली इमारत नहीं है। जिले में दो ट्रॉमा सेंटरों (आधुनिक सुविधायुक्त आपात चिकित्सा केंद्र) की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। इमरजेंसी में इलाज के जरिए जिंदगी बचाने का काम इन दोनों आपात चिकित्सा केंद्रों द्वारा नहीं किया जा सका है।
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जिले के मैदानी हिस्से टनकपुर और लोहाघाट में 2.02 करोड़ रुपये की लागत से ट्रॉमा सेंटर बनाए गए, मगर इनका उपयोग अब तक नहीं हुआ, जबकि इन दोनों इमारतों का हस्तांतरण भी पिछले साल स्वास्थ्य विभाग को कर दिया गया है। भवन बनने के बाद इनका इस्तेमाल कैसे और कब तक हो सकेगा?

इस सवाल का जवाब न स्वास्थ्य विभाग के पास, न प्रशासन के पास और नहीं जनप्रतिनिधियों के पास है। ट्रॉमा सेंटरों का उपयोग नहीं होने की वजह उपकरण से लेकर डॉक्टर और अन्य पदों का सृजन नहीं होना है। ट्रॉमा सेंटर में सर्जन, निश्चेतक, न्यूरो सर्जन सहित डॉक्टरों के छह पद और इतने ही पैरा मेडिकल स्टाफ के पद होने चाहिए।
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सीएमओ डॉ. विनोद टोलिया का कहना है कि जिले के दोनों ट्रॉमा सेंटरों के भवन पिछले साल सितंबर में स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया है, लेकिन अभी डॉक्टर और अन्य पदों का सृजन नहीं हो सका है। पदों को सृजित करने के लिए लिखा गया है। उपकरण और डॉक्टरों की तैनाती होने के बाद ही टॉमा सेंटर शुरू हो सकेगा।

डीएम डॉ. अहमद इकबाल का कहना है कि ट्रॉमा सेंटरों के मामले की पड़ताल की जाएगी। विभाग के अनुपयोगी केंद्रों का लाभ मरीजों को कैसे मिले, इसकी समीक्षा कर हर जरूरी कदम उठाया जाएगा। 13-14 जून को बैठक कर स्वास्थ्य विभाग के समूचे कामकाज की समीक्षा की जाएगी। इसमें ब्लड बैंक, ट्रॉमा सेंटर के अलावा डॉक्टरों के बगैर चलने वाले अस्पताल, संबद्धीकरण सहित अन्य सभी मुद्दों पर विचार किया जाएगा।

जिले में इमरजेंसी तो छोड़िए, सामान्य इलाज की भी ठीकठाक व्यवस्था नहीं है। ऐसे में ये ट्रॉमा सेंटर बेहद लाभदायक होते। इस वक्त गर्भवती महिलाओं, रोड दुर्घटनाओं, भूस्खलन, अतिवृष्टि, आपदा और अन्य मौकों पर पीड़ितों को जिले से बाहर करीब 200 किमी दूर हल्द्वानी, बरेली अथवा दूसरे उच्च केंद्रों में दौड़ लगानी पड़ रही है, जिसमें न केवल असुविधा और भारी धन खर्च होता है, बल्कि मरीज की जिंदगी के लिए भी खतरे की आशंका रहती है। एक अनुमान के मुताबिक वक्त पर इलाज नहीं मिलने से हर साल 18 से ज्यादा लोगों की मौतें हो रही है।

लोहाघाट (चंपावत)। 90 लाख रुपये से पीपीपी अस्पताल परिसर में बने ट्रॉमा सेंटर के शुरू न होने से लोगों की अकाल मौतें हो रही हैं। अब इस ट्रॉमा सेंटर के तीन कमरों से पीपीपी अस्पताल का प्रशासनिक कामकाज चलाया जा रहा है।
2015 में ट्रॉमा सेंटर स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया, मगर इसमें इस वक्त कार्यालय चलाया जा रहा है।

ट्रॉमा सेंटर के चालू नहीं होने से दुर्घटनाओं में घायल होने वाले रोगियों को प्राथमिक इलाज के बाद हायर सेंटर भेजना मजबूरी बन गया है। ट्रॉमा सेंटर के शुरू होने का लाभ लोहाघाट, बाराकोट, पाटी के अलावा जिले से लगी नेपाल सीमा के लोगों को भी मिलता।

इस साल हुई दुर्घटनाओं में 6 लोग समय पर इलाज नहीं मिलने से दम तोड़ चुके हैं। ताजा वारदात में 29 अप्रैल को मौकोट के पास हुई वाहन दुर्घटना में तीनों घायलों को वक्त पर इलाज मिल जाता, तो उनकी जिंदगी बच सकती थी। विधायक पूरन सिंह फर्त्याल का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर को शुरू करने का मामला विधानसभा में उठाया गया है। ट्रॉमा सेंटर को शुरू कराने के लिए शासन स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
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