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भीषण गर्मी में नौले के पानी से मिल रही तृप्ति

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बालेश्वर नौला। - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। सरकार जहां तमाम दावों के बाद भी लोगों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने में नाकाम है। इस भीषण गर्मी में जब कई जगहों पर लोग पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने के लिए मजबूर हैं। ऐसी गर्मी में भी जिले के पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद नौले लोगों की प्यास बुझा रहे हैं। जल स्तर के कम होने के बावजूद भी शहर के नजदीक बालेश्वर का नौला लोगों को तृप्त कर रहा है।
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पानी से लबालब भरे इस नौले से लोगों को भरपूर पानी मिल रहा है तो इसकी वजह सरकारी पहल नहीं बल्कि लोगों की जिम्मेदारी और सामूहिक पहल है। यहां तक कि इस नौले का उपयोग करने से पहले रोजाना 150 मीटर दूर स्थित बालेश्वर मंदिर में जलाभिषेक किया जाता है। 1272 ईसवीं में चंद राजा थोर चंद द्वारा निर्मित बालेश्वर नौला धरोहर के साथ ही लोगों की प्यास बुझाने के भी काम आ रहा है। करीब चार फुट गहराई वाले इस नौले में जल संवर्धन को तमाम उपाय किए गए हैं। नौले को गंदगी से बचाने के लिए दरवाजे में नियमित रूप से ताला भी लगाया जाता है। नौले से पानी निकालने के लिए एक बाल्टी रखी गई है। इसी बाल्टी से दूसरे बर्तनों में पानी भरा जाता है। रोजाना 40 से अधिक लोग यहां से पानी भरते हैं।
बालेश्वर नौले के संरक्षण में सभी लोगों का मिलाजुला प्रयास है। इसकी पहल करीब तीन दशक पूर्व गंगा गिरि और भैरव गिरि ने की। नौले के भीतर से सीधे पानी नहीं निकाला जाता है, बल्कि नौले की बाल्टी से दूसरे बर्तनों में पानी भरा जाता है। जलाभिषेक के बाद सुबह और शाम दो-दो घंटे तक पानी निकाला जाता है। - पवन गिरि, महंत, बालेश्वर मंदिर।
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जरूरत के सापेक्ष उपलब्धता सिर्फ 47 प्रतिशत पानी की
चंपावत। जिले के 53953 परिवारों में से से 28479 के पास पेयजल कनेक्शन हैं। हर दिन पेयजल पर जिला योजना मद से औसतन 1.58 लाख रुपये से अधिक खर्च हो रहा है। इसके अलावा राज्य सेक्टर और अन्य योजनाओं से भी खर्च होता है। इतनी बड़ी रकम के व्यय होने के बावजूद लोगों की प्यास नहीं बुझ पा रही है। रोजाना औसतन 178 लाख लीटर की जरूरत के सापेक्ष आधे से भी कम (47.23 प्रतिशत) पानी ही लोगों को मिल पा रहा है। ऐसे में लोग नलों से ज्यादा नौलों पर आश्रित हैं।
चार हजार लोग नौलों पर निर्भर
चंपावत। जिले के पहाड़ी क्षेत्र में 51 से ज्यादा नौले हैं। चार हजार से अधिक लोग इन नौलों पर निर्भर हैं। 15 फीसदी नौलों का पानी उपयोग लायक नहीं है। इनके पानी का उपयोग कपड़े धोने और नहाने के लिए ही होता है। लोहाघाट, चंपावत, बाराकोट और पाटी क्षेत्र में लोग पानी के लिए 4505 स्टैंडपोस्ट और 811 हैंडपंपों से काम चलाने के लिए मजबूर हैं।
जल संकट से निपटने के लिए बनाई योजना
चंपावत। जल संस्थान के ईई विलाल यूनुस का कहना है कि गर्मियों में पानी के संकट से निपटने के लिए विभाग ने 69.25 लाख रुपये की कार्ययोजना बनाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में 27.35 लाख और शहरी क्षेत्रों में 41.90 लाख रुपये खर्च होंगे। इस रकम का उपयोग टैंकर और अन्य माध्यम से पानी पहुंचाने के लिए किया जाएगा।
खूबियों से भरे हैं मानेश्वर, अक्कलधारा और एकहथिया नौला
चंपावत। पौराणिक महत्व के मानेश्वर मंदिर समूह परिसर में एक पुराना नौला भी है। पर्यावरणविद् विवेक जोशी बताते हैं कि यह नौला गर्मियों में तो पानी से भरा ही रहता है, साथ ही इससे स्नान करने से त्वचा के कई रोगों में फायदा भी होता है। महंत रमनपुरी महाराज का कहना है कि आबादी से दूर और वनों से घिरे होने के चलते भी यहां का पानी औषधीय गुणों से भरपूर रहता है। सेवानिवृत्त प्रमुख चिकित्साधीक्षक डॉ. आरके जोशी का कहना है कि किसी भी नौले का जल तभी तक शुद्ध रह सकता है, जब उसके आसपास गंदगी न हो। वहीं शहर से छह किमी दूर ढकना के आबादी विहीन क्षेत्र में एक हाथ से बना एकहथिया नौला उम्दा वास्तु शैली का नमूना है। इसी तरह लोहाघाट क्षेत्र का अक्कलधारा नौले के पानी के लिए लोग तीन किमी दूर से आते हैं।
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