पाटी (चंपावत)। मां वाराही धाम देवीधुरा में आषाढ़ी कौतिक के दिन लगने वाला बगवाल मेला उत्तर भारत के मेलों में अलग पहचान बनाए हुए है। लाखों लोगों की आस्था के प्रतीक मां वाराही धाम देवीधुरा में बगवाल खेलने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। अंग्रेज हुकूमत के समय एक अंग्रेज अधिकारी ने पत्थर युद्ध को रोक कर उसकी जगह रबड़ या गोबर की गेंद से बगवाल खेलने का आदेश दिया तो उसके बाद अंग्रेज अधिकारी बीमार रहने लगा। इसे दैविक शक्ति मानते हुए उन्होंने अपना आदेश वापस ले लिया।
मां वाराही धाम का जिक्र शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट ने अपनी मैन ईटर ऑफ कुमाऊं पुस्तक में किया हैं। मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही हैं। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक चम्याल, लमगड़िया, वालिग और गहड़वाल चार खामों में हर साल नरबलि देने की प्रथा थी।
कुछ लोग बताते है कि चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की नरबलि देने की बारी आई तो वृद्धा ने मां की तपस्या की। वृद्धा की तपस्या से प्रसन्न हो कर मां से नरबलि का चारों खामों से विकल्प खोजने को कहा। चार खामों की सहमति से एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाकर मां की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। तब से हर साल बगवाल खेली जाने लगी।