चंद्रशेखर जोशी
भैंसियाझाला (चंपावत)। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र खटीमा से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है भैंसियाझाला गांव। ये फासला भले ही मामूली हो लेकिन गांव और विकास के बीच फासला बहुत अधिक है। वादों के पूरा होने की आस में राज्य गठन के बाद से ही साल दर साल और चुनाव दर चुनाव बीत रहे हैं। राज्य में पांचवीं बार विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और फिर वादों की चाशनी के साथ नेता गांव की गलियों में दस्तक देकर अपनी सफलता की राह तलाश रहे हैं लेकिन गांव वालों को अपनी राह (सड़क) तक नहीं मिल सकी।
हर बार चुनावों में उम्मीदवारों ने 1.300 किमी सड़क बनाने का सब्जबाग दिखाया लेकिन पूरा करने का नाम किसी ने नहीं किया। जंगलात की जमीन भी अड़चन बन रही है। गांव के लोग कहते हैं कि इस अनदेखी से उनकी राह तो पथरीली है ही अब उससे भी ज्यादा चुभन होने लगी है। दुष्कर हो रही जिंदगी के बीच चुनावों में छला जाना यहां ग्रामीणों की नियति ही बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अब और नहीं...। कहते हैं कि इस बार 14 फरवरी को वे अपने हर वादे और दावे का हिसाब करके ही वोट देंगे।
चंपावत जिले की गुदमी ग्राम पंचायत का 538 की आबादी वाला भैंसियाझाला गांव मैदानी क्षेत्र में जरूर है लेकिन यहां के लोगों की जिंदगी बहुत दुरूह और दुर्गम है। वे चुनौतियों के पहाड़ के नीचे दबे हुए हैं। नेपाल के चांदनी दुधारा के पड़ोस में बसे इस गांव के न लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं और न ही उन्हें सरकारी नौकरी की कोई उम्मीद है। आय का जरिया खेती और पशुपालन है लेकिन लावारिस और जंगली जानवरों से फसल को बचाने में ही ग्रामीणों का अधिकतर समय बीत रहा है। गांव मिलाप सिंह कहते हैं कि इसके बाद अगर फसल हो भी गई तो दूरी की वजह से वाजिब दाम नहीं मिल पाता। पिछले साल 1975 रुपये क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य के बजाय गांव में गेहूं 1350 रुपये में बेचना पड़ा।
यहां पहुंचते-पहुंचते हर घर नल का नारा भी सूखने लगता है। प्यास बुझाने के लिए खुद के हैंडपंपों का ही सहारा है। गांव से तीन किमी दूर बनबसा में सरकारी अस्पताल है, लेकिन खून की जांच तक की सुविधा न होने से लोग ऊधमसिंह नगर जिले के खटीमा जाने के लिए मजबूर हैं। इससे भी खराब हाल यह कि सड़क के अभाव में गांव के लोगों को आपातसेवा 108 एंबुलेंस की सुविधा भी नसीब नहीं हो पाती है। ग्रामीण कहते हैं कि सड़क का न होना उनकी बेहतरी में रोड़ा बन रहा है।
आठ दशक बाद भी नहीं मिला जमीन का स्वामित्व
चंपावत। पशुपालन की बहुतायत के कारण करीब 80 साल पहले बसे इस गांव का नाम भैंसियाझाला रखा गया। गांव की बुजुर्ग माधवी बताती हैं कि शुरू में यहां मनिहारगोठ सहित कई गांवों के लोग भैंस पालते थे और खुद के रहने के लिए झाला बनाते थे। इस वजह से गांव का नाम भैंसियाझाला पड़ गया। इस गांव की सबसे बड़ी त्रासदी काबिज वनभूमि पर स्वामित्व न मिलना है। 90 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण वनभूमि पर काबिज हैं। इसके नियमितीकरण के लिए ग्रामीण थक गए।
ये हैं गांव की मुख्य जनसमस्याएं
1. काबिज वनभूमि पर मिले स्वामित्व।
2. भैंसियाझाला से गढ़ीगोठ तक सड़क बने।
3. जलभराव से बचाव के लिए नाला निर्माण।
4. जानवरों से खेती बचाने के लिए सोलर फेंसिंग।
5. हर घर नल सुविधा का लाभ पहुंचाया जाए।
भैंसियाझाला के लोगों को काबिज जमीन का स्वामित्व देने की प्रक्रिया खंड स्तर पर विचाराधीन है। इसकी खंड स्तरीय समिति चुनाव के बाद दावों की समीक्षा कर जिले को भेजेगी। - हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम, टनकपुर।
क्या कहते हैं मतदाता
रोजगार के लिए महानगरों में जाना पड़ता है। कोरोना बढ़ने से होटल में काम बंद हुआ, तो चार दिन पहले घर लौटना पड़ा। सड़क होती, तो सुविधाएं बढ़ती और कारोबार भी। - बहादुर चंद।
नेता वोट के समय आते हैं। वादे कर जाते हैं, जीतने के बाद लौटते नहीं। खेतों से ही गुजर होती थी, लेकिन अब जंगली जानवर उसे भी नहीं छोड़ रहे। सबकी आजीविका सुधरी जाए। - माधवी देवी।
हमारा परिवार वर्ष 1992 में सूखीढांग से भैंसियाझाला आया लेकिन इन 29 वर्षों में कुछ खास नहीं बदला। नेता वादा करते हैं लेकिन काम नहीं। सड़क निर्माण सबसे जरूरी है। - जोहर सिंह बिष्ट।
गांव में बरसात में आफत आती है, चलना मुश्किल हो जाता है। छोटे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। जलनिकासी के उपाय और सड़क बनाकर ही गांव का भला हो सकता है। - सुनीता।
चुनावी वादों पर काम नहीं हुआ। न स्कूल का उच्चीकरण हुआ, न ही गढ़ीगोठ से जगबुड़ा पुल गड्ढामुक्त हो सकी। गांव में सार्वजनिक पथप्रकाश, स्टैंडपोस्ट भी नहीं लग सके। - सुरेश चंद।
25 साल से न हमारा गांव बदला और न ही हमारी हालत। आय न होने के बावजूद एक बीपीएल कार्ड तक नहीं बन पा रहा है। रोजगार के अवसर बढ़ाए बगैर आय कैसे बढ़ेगी। - सीता देवी।
भैंसियाझाला गांव की दो सबसे बड़ी दिक्कतें हैं। 200 मीटर सड़क बनने में देरी हो रही है। वनभूमि पर स्वामित्व पाने के लिए पत्रावली तहसील कार्यालय में जमा कराई गई है। - जसवंत बसेड़ा, ग्राम प्रधान प्रतिनिधि और पूर्व बीडीसी सदस्य।